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कविता- बचा रहे मनुष्य

कोरोना का वायरस नहीं देख रहा जाति-धर्म या देश अमीर-गरीब की रेखा खान-पान, रंग-रूप कद -काठी या भेष, काश संक्रमण में नष्ट हो जाए सब असमानता भेद संघर्ष के अंत में मात्र बचा रहे मनु...

कविता - शायद शत्रु डर जाए

शायद शत्रु डर जाए      (अशोक शिरोडे) ------------------------- हमने नहीं बांधे तोरणद्वार अपने घर के द्वार हमने नहीं बनायी पथ पर कतार हमने नहीं थामे हाथों रंग बिरंगे पुष्प-गुच्छ हार हमने नहीं ग...

दिए के पीछे के प्रश्न और छुपे सच

    प्रकाश के पीछे की मंशा              (अशोक शिरोडे) ------------------------------------------       हमारे प्रधानमंत्री के निर्देश है कि "हमें प्रकाश के तेज को चारों तरफ फैलाना है"।   इसी का पालन करते हुए आज रा...

कोरोना की चुनोती

▪कोरोना की चुनोती▪              (अशोक शिरोडे) ---------------------------- कोरोना के डर से दुबके है घर में, बिना कर्फ्यू के सन्नाटा पसरा है शहर में  । कोरोना कितना बलशाली साबित हुआ भयभीत इंसान बोन...

विवेक सम्मत जनमत ?

2019 का लोकसभा चुनाव अनेक बातो के लिए याद रखा जाएगा। इतिहास में पहली बार पूरा चुनाव व्यक्ति केंद्रित रहा। राजनीतिक दल के बदले मात्र एक व्यक्ति का समर्थन या विरोध के नाम पर देश ...

पर्दे के पीछे का सच

*मोदी का अंबानी सफ़रनामा*- ------------------------------------------------ *बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर आपका ध्यान खींच रहा हूँ । 02 मिनट से अधिक का समय नही लगेगा, पढ़ जरूर लीजिएगा* *क्योकि बात वोट की नही देशहित से जुड़ी ...

कविता - शिल्पकार

शिल्पकार कवि नहीं होता शिल्पकार वह तो होता है कलमकार शब्दों से खेलना तोड़ना-मरोड़ना और शब्दों का जाल बनाना जानता है कवि शिल्प और कला दोनों से दूर कलम और कागज में जीता है कवि शिल्पकार तो वह स्त्री - पुरुष हैं जो अपने अनमोल पसीनें से सींचते हैं धरा को रचते हैं श्रम का संसार जीवन के पन्ने पर  ।। * अशोक शिरोडे* 9039940034