मनुष्यता का बोध
मनुष्यता का बोध ---------------------- ईश्वर ने तुमसे कभी कुछ नहीं मांगा। न व्रत,न होम,न फल,न फूल। उसने बस चाहा कि तुम वैसा ही बन जाओ, जैसे तुम मूलतः थें निर्मल, सरल, सहज, निर्दोष। ईश्वर किसी देवालय में नहीं रहता है वह तो हर व्यक्ति के मन के अंदर है। ईश्वर तो हवा, पानी, पेड़-पौधों और हर मनुष्य के भीतर मौजूद हैं। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि सबमें एक ही ईश्वर का अंश है, तो हमारे मन में हर जीव के प्रति प्रेम, करुणा और सम्मान का भाव जागृत होता है। सिर्फ साँस लेना ही जीवन नहीं है बल्कि किसी और की साँस बन जाना ही असली जीवन है। वो जो स्वार्थ से ऊपर उठे जो “मैं” से आगे बढ़कर “हम” तक पहुँचे वही सच में इंसान है। मरना यहाँ केवल शरीर का अंत नहीं बल्कि अपने अहंकार छोड़ देना है अपने सुख त्याग देना है किसी और के दर्द को अपना मान लेना है। जब कोई किसी दूसरे के आँसू पोंछने के लिए अपने सुखों का त्याग करने को तत्पर हो जाता है वहीं इंसानियत जन्म लेती है। मनुष्य होने और मनुष्यता का बोध होने में अंतर है। मनुष्यता बोध होते ही वह यांत्रिक ...