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Kangen Water - cure to cancer

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🔬 *क्या कहता है विज्ञान? कैंसर की असली वजह और बचाव!* 🔬 नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक **डॉ. ओटो हेनरिक वारबर्ग (Dr. Otto Heinrich Warburg)** ने साबित किया था कि कैंसर वाले टिश्यूज हमेशा *एसिडिक (Acidic)* होते हैं, जबकि स्वस्थ टिश्यूज *एल्कलाइन (Alkaline)* होते हैं। इमेज के अनुसार, शरीर में दो मुख्य स्थितियों के कारण बीमारियाँ पनपती हैं: 1️⃣ **एसीडोसिस (Acidosis):** शरीर में एसिड की मात्रा बढ़ना। 2️⃣ **हाइपोक्सिया (Hypoxia):** सेल्स में ऑक्सीजन की कमी होना। 💧 कैंगेन वॉटर (Kangen Water) कैसे करता है बचाव? कैंगेन वॉटर आपके शरीर का नेचुरल बैलेंस और हेल्थ रिस्टोर करने में मदद करता है:  * *एल्कलाइन हाइड्रेशन:* एसिडिटी को न्यूट्रलाइज कर pH बैलेंस बनाए रखता है।  * *ऑक्सीजन में सुधार:* सेल्स तक ऑक्सीजन की डिलीवरी को बेहतर बनाता है।  * *इम्यून सिस्टम को सपोर्ट:* शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।  * *ओवरऑल वेलनेस:* आपको रखता है ऊर्जवान और स्वस्थ। *"Balance your water, balance your body. Alkaline water is the foundation of good health."* अपने पानी को बदलिए और अप...

गांधी व गोडसे- जावेद अख्तर

"... कहीं एक गांधी चल रहा है, कहीं एक गोडसे कत्ल के लिए खड़ा है... लेकिन गोडसे की गोलियां नहीं खत्म होती और गांधी की ज़िंदगी नहीं खत्म होती" जावेद अख्तर को सुनना मतलब अपनी बौद्धिकता के liberal पहलू को एक नया आयाम देना।  यूट्यूब ने मुझे जावेद अख्तर की एक तकरीर का शॉर्ट परोसा। इस तकरीर में वे गांधी और गोडसे की तुलना विचारधारा के धरातल पर करते हैं। वे कहते हैं कि गोडसे की विचारधारा का समर्थन करने वाले दिग्गज राजनेताओं को ना चाहते हुए भी गांधी के आगे सर झुकाना पड़ता है। जावेद को पक्का यकीं है कि गॉडसेवादी कभी भी गांधी का कद छोटा नहीं कर पाएंगे। प्रस्तुत है जावेद की तकरीर का एक हिस्सा:    "जब एक 80 साल का बूढ़ा एक मैदान पार कर रहा था, सहारा लेके लोगों का, और एक आदमी ने उस बूढ़े आदमी के कमजोर से जिस्म में तीन गोलियां उतार दीं। ये जो आदमी था इसको इस बूढ़े आदमी से नफरत थी क्या? क्या वो उसे मारना चाहता था? या कुछ और मारना चाहता था? उस ख्याल को, उस सोच को, उस ख्वाब को, उस उम्मीद को मारना चाहता थे जिसका नाम गांधी था? लेकिन अरमान और ख्वाब और उम्मीद, उसूल और सच्चाईयां गोलियों से नहीं मरते।...

मानसिक तनाव व निदान

*मानसिक तनाव* -------------------------- *तनाव सिर्फ दिमाग में चलने वाला एहसास नहीं, बल्कि पूरे शरीर को प्रभावित करने वाली जैविक प्रतिक्रिया है। जब इंसान लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो शरीर लगातार “अलर्ट मोड” में बना रहता है।* *मानसिक तनाव से शरीर में रासायनिक बदलाव*  दिल की धड़कन तेज होने लगती है, मांसपेशियाँ जकड़ जाती हैं, पेट की प्रक्रिया बिगड़ सकती है और दिमाग धुंधला महसूस होने लगता है तनाव होते ही दिमाग इसे "खतरा" मान लेता है और शरीर में पूरा केमिकल अलार्म सिस्टम चालू हो जाता है। इसे Fight-or-Flight रिस्पॉन्स कहते हैं। *तुरंत होने वाले रासायनिक बदलाव - कुछ सेकंड में*  1. *एड्रेनालाईन नॉरएड्रेनालाईन*   2.  - *कहां से*: एड्रिनल ग्रंथि से रिलीज      - *असर*: दिल की धड़कन तेज, ब्लड प्रेशर बढ़ना, सांस तेज, मसल्स में खून भेजना, शुगर लेवल बढ़ाना      - *मकसद*: तुरंत एनर्जी देना ताकि लड़ो या भागो    2. *कोर्टिसोल*      - *कहां से*: एड्रिनल कॉर्टेक्स से, HPA एक्सिस एक्टिव होने पर   ...

मनुष्यता का बोध

मनुष्यता का बोध ---------------------- ईश्वर ने तुमसे कभी कुछ नहीं मांगा।  न व्रत,न होम,न फल,न फूल।  उसने बस चाहा कि तुम वैसा ही बन जाओ,  जैसे तुम मूलतः थें   निर्मल, सरल, सहज, निर्दोष। ईश्वर किसी देवालय में नहीं रहता है वह तो हर व्यक्ति के मन के अंदर है।  ईश्वर तो हवा, पानी, पेड़-पौधों और हर मनुष्य के भीतर मौजूद हैं।  जब हम यह स्वीकार करते हैं कि सबमें एक ही ईश्वर का अंश है, तो हमारे मन में हर जीव के प्रति प्रेम, करुणा और सम्मान का भाव जागृत होता है।  सिर्फ साँस लेना ही जीवन नहीं है बल्कि किसी और की साँस बन जाना ही असली जीवन है। वो जो स्वार्थ से ऊपर उठे जो “मैं” से आगे बढ़कर “हम” तक पहुँचे वही सच में इंसान है।  मरना यहाँ केवल शरीर का अंत नहीं बल्कि अपने अहंकार छोड़ देना है अपने सुख त्याग देना है किसी और के दर्द को अपना मान लेना है।  जब कोई किसी  दूसरे के आँसू पोंछने के लिए अपने सुखों का त्याग करने को तत्पर हो जाता है वहीं इंसानियत जन्म लेती है। मनुष्य होने  और मनुष्यता का बोध होने में अंतर है। मनुष्यता बोध होते ही वह यांत्रिक ...

नव वर्ष

नए साल में नई पहल हो, कठिन जिंदगी .... सरल हो, नये संकल्प व नए पथ हो  सुखद सबका ... नया साल हो, आगे बढ़ने के प्रयास सबके हर हाल में सदा ..... सफल हो, बिखरे आभा दिनकर की  उत्साह उमंग के.... हर पल हो, विचार-कार्य-परिश्रम का आपके हाथ में ... प्रतिफल हो, समय से सब सधे, काज हो पूरे नव वर्ष में ऐसी .... हलचल हो, विश्व में कहीं भी न युद्ध  हो  वाणी हो मधुर ...नयन सजल हो,  विवाद नहीं आपस मे संवाद हो, मानवता के सवाल सब.... हल हो, मानव मन मे करुणा का वास हो ईर्ष्या - द्वेष का नाश .... समूल हो, आपदा- घृणा रहित हो विश्व  प्रेम-करुणा मन में ....सबल हो, नए साल में  ऐसी नई पहल हो, कठिन जिंदगी  .... सरल हो ।। ------------------------------------------- अशोक शिरोडे 31 दिसंबर 2025

सियासत का मैदान - नफरत का खेल

*सियासत के मैदान में नफरत का खेल* ----------------*----------------- राजनीति का मूल मंत्र है सत्ता और सत्ता तक पहुँचने का सबसे छोटा व आसान रास्ता आज नफरत बन चुका है। जनता को जाती व धर्म के नाम विभाजित कर दो। उन्हें जीवन के मूलभूत सवालों पर सोचने और बात करने का मौका ही मत दो।  जनता को जोड़ना मुश्किल है, लेकिन तोड़ना आसान है।  इसलिए हर चुनाव से पहले एक नया दुश्मन गढ़ा जाता है। कभी मज़हब के नाम पर, कभी जाति के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर।  नफरत का खेल सुनियोजित होता है। सोच समझकर योजनाबध्द रूप से इस षडयंत्र  का जाल बुना जाता है। हर चुनाव के पहले एक डर पैदा किया जाता है। बताया जाता है कि फलां समुदाय तुम्हारी नौकरी खा जाएगा, तुम्हारी संस्कृति मिटा देगा, तुम्हारे बच्चों का भविष्य छीन लेगा। भावनात्मक तौर पर मन मे डर पैदा किया जाता है , डर के बाद गुस्सा आता है। गुस्से के बाद भीड़ बनती है। और भीड़ का कोई विवेक नहीं होता। उसकी कोई दिशा नहीं होती। भीड़ में  एक उबाल आता है। नफरत के बहाव में भीड़ बह जाती है। इस बहाव के आवेश में  बिना सोचे समझे बोलती है, वोट देती है , लड़ती ...

कवित - सामाजिक मूर्छा का दौर

अजब बदला है राजनीति का मिजाज इस दौर में सच की आवाज कहीं खो गई मन की बात - जुमलों के शोर में धन दौलत की चोरी को सुनते  थे वोट की चोरी होने लगी इस दौर में  मदारी के तमाशे में सब हैं मगन  कोई कुछ न बोले अंधभक्ति के दौर में   राजा और रंक दोनों है अपने मे मस्त सामाजिक मूर्छा के इस विकट दौर में।। - अशोक शिरोडे -