परसाई की रचनाएं "सोचना" और "सवाल करना" सिखाती है (डॉ.अशोक शिरोडे)
परसाई की रचनाएं
"सोचना" और "सवाल करना" सिखाती है
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हरिशंकर परसाई का नाम हिंदी साहित्य में व्यंग्य के स्तंभ के रूप में लिया जाता है। उनके लिए 'लोक शिक्षा' का अर्थ केवल स्कूली पाठ्यक्रम पढ़ाना नहीं था, बल्कि यह एक सशक्तिकरण का हथियार था।
हरिशंकर परसाई (1924-1995) हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध व्यंग्यकार थे, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज की कुरीतियों, विसंगतियों और राजनीतिक - सामाजिक भ्रष्टाचार पर तीखे प्रहार किए।
उनका मानना था कि सच्ची शिक्षा वह है जो आम जन (लोक) को उनके अधिकारों, सामाजिक विषमताओं और शोषण के तंत्र के प्रति जागरूक करे। उनका लेखन 'लोक शिक्षण' (जनशिक्षा) का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। उनकी रचनाओं ने न केवल पाठकों का मनोरंजन किया, बल्कि उन्हें सामाजिक सच्चाई से भी रूबरू कराया।
लोक शिक्षा के प्रति विचार
परसाई जी ने अपने लेखन को ही लोक शिक्षा का सबसे बड़ा माध्यम बनाया। उनकी रचनाएँ एक कक्षा की तरह हैं जहाँ पाठक समाज का यथार्थ पाठ पढ़ता है। उन्होंने समाचार पत्र देशबंधु में "पूछिए परसाई से" कॉलम में अनेकों पाठकों के विविध सवालों का सटीक व रोचक जबाब दिए। उनके दिए गए जबाब से पाठकों में जीवन के विविध विषयों को देखने व समझने की नई दृष्टि विकसित हुई।
परसाई जी की शिक्षा-दृष्टि मौलिक और क्रांतिकारी थी। परसाई के विचार में शिक्षा एक जागरूकता का साधन है। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य डिग्री हासिल कर नौकरी पाना नहीं, बल्कि समाज में फैले ढोंग, पाखंड, भ्रष्टाचार और अन्याय को पहचानने की दृष्टि देना था। शिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अंधविश्वास और रूढ़ियों का विरोध करे। वे अनुभव , यथार्थपरक व तार्किक शिक्षा के पक्षधर थे।
परसाई का मानना था कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली एक ऐसा "क्लर्क पैदा करने का कारखाना" है जो व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यंत्रवत लोग तैयार करती है, उसे बदलने के लिए नहीं। उनकी लोक शिक्षा इसी व्यवस्था की पोल खोलती है। उनकी शिक्षा में नैतिकता का पाठ पुस्तकीय ज्ञान नहीं था। वह तो व्यवहारिक जीवन में ईमानदारी, स्पष्टवादिता और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता सिखाती थी। उनकी शिक्षा का केंद्र बिंदु आम आदमी, गरीब, पीड़ित और शोषित वर्ग था। वे चाहते थे कि शिक्षा इस वर्ग को उसकी ताकत का अहसास कराए।
उन्होंने व्यंग्य को केवल हंसाने का जरिया नहीं, बल्कि सोचने और सवाल खड़े करने का माध्यम बनाया। उनकी कहानियाँ और निबंध पाठक को मजबूर करते हैं कि वह समाज में पुरानी सामाजिक रूप से स्वीकृत मान्यताओं पर सवाल उठाए।
उन्होंने अपने लेखन में ऐसे विषय उठाए जो सीधे तौर पर आम जनता के जीवन से जुड़े थे। शोषण , धार्मिक पाखंड व कटुता, भ्रष्टाचार, शासकीय अधिकारियों की लालफीता शाही , अंधविश्वास, कुरीतियों, पर सटीक प्रहार किया। उनके लेखन में समाज की हर विसंगति की चीरफाड़ देखने को मिलती है।
'भोलाराम का जादू' जैसी कहानियाँ भ्रष्टाचार की जटिल प्रक्रिया को इतने सरल ढंग से समझाती हैं कि कोई भी पढ़ा-लिखा या अशिक्षित व्यक्ति उसे समझ सकता है।
परसाई ने मानवीय मूल्य आधारित समाज के निर्माण करने पर जोर दिया है। वे ईमानदारी, सच्चाई और मानवीय संवेदनाओं को महत्व देते थे। उन्होंने स्वार्थी और भ्रष्ट लोगों की खिल्ली उड़ाकर समाज को सही राह दिखाने का प्रयास किया।
उनकी अधिकांश रचनाएँ लोक शिक्षा का हिस्सा हैं। कुछ विशेष रचनाएँ हैं जो इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। 'वैष्णव की फिसलन' और 'तट की खोज' जैसी रचनाएँ धार्मिक आडंबर और ढोंग पर करारी चोट करती हैं। उन्होंने राजनीतिज्ञों द्वारा जनता को मूर्ख बनाने की तरकीबों को बेनकाब किया। 'न्याय' जैसी रचनाओं में उन्होंने दिखाया कि कैसे सिस्टम आम आदमी के लिए एक दु:स्वप्न बन जाता है। "विकलांग श्रद्धा का दौर" (निबंध-संग्रह) में समकालीन समाज में फैली कुरीतियों और विसंगतियों का चित्रण किया गया है। "पगडंडियों का जमाना" (आत्मकथा) एक सामान्य पृष्ठभूमि के व्यक्ति के संघर्ष और समाज की यथास्थिति को देखने का नजरिया सिखाती है।
परसाई जी ने जटिल सामाजिक - राजनीतिक मुद्दों को अत्यंत सरल, बोलचाल की हिंदी में प्रस्तुत किया है। यही उनकी लोक शिक्षा की सबसे बड़ी सफलता थी। उनकी भाषा पाठक से सीधा संवाद करती है।
परसाई जी ने अपने निजी जीवन में भी लोक शिक्षा के सिद्धांतों को अपनाया था।
वे जीवन भर सादगी से रहे। उनका जीवन ही उनके विचारों की प्रामाणिकता का प्रमाण था। वे राजनीति में भी सक्रिय रहे। उन्होंने 'जनता' नामक साप्ताहिक पत्र निकाला और सक्रिय राजनीति में भी हिस्सा लिया ताकि व्यवस्था को बदलने का प्रयास सीधे तौर पर किया जा सके।
परसाई का लोगों से जमीनी स्तर पर जुड़ाव था। उन्होंने आम लोगों व अपने बीच कोई दीवार नहीं खड़ी होने दी। वे आम लोगों के बीच रहे, उनसे संवाद करते रहे। उनकी समस्याओं को समझा और उसे ही अपने लेखन का विषय बनाया।
हरिशंकर परसाई के लिए लोक शिक्षा एक सामाजिक उद्देश्य था। उन्होंने पारंपरिक शिक्षा प्रणाली की सीमाओं को पहचाना और अपने व्यंग्य रूपी हथियार से एक वैकल्पिक शिक्षा तंत्र बनाया। उनका सम्पूर्ण साहित्य एक ऐसी पाठ्यपुस्तक है जो पाठक को "सोचना" और "सवाल करना" सिखाती है। उन्होंने जनता को शिक्षा दी कि वह अंधानुकरण न करे, दिखावे और भ्रष्टाचार का विरोध करे। उन्होंने लोगों से मानवीय मूल्य आधारित समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने की प्रेरणा दी। यही उनकी सच्ची लोक शिक्षा थी। परसाई ने अपने व्यंग व पत्र पत्रिकाओं में अपने कॉलम के माध्यम से लोकशिक्षण का जो कार्य किया है उसकी मिसाल हिंदी साहित्य में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती है।रसाई की रचनाएं "सोचना" और "सवाल करना" सिखाती है।
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डॉ. अशोक शिरोडे
बिलासपुर
दिनांक : 23 अगस्त 2025
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