संविधान की प्रस्तावना :

संविधान की प्रस्तावना : पढ़े समझे व पालन करें 
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    प्रस्तावना की शुरुआत 'हम भारत के लोग' से शुरू होती है और 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' पर समाप्त होती है।
     जब बात भारत के संविधान की होती है तब इसमें सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आता है प्रस्तावना का क्योंकि यही एक चीज़ है जो कि पूरे संविधान की तस्वीर को बयां करती है । सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने एक निर्णय में कहा है  "जब भी कभी संविधान में किसी भी प्रकार का संशोधन होगा और अगर वो प्रस्तावना के उद्देश्य को पूरा नहीं करता तो ऐसे संशोधन को शून्य घोषित किया जा सकता है," इसीलिये  कहा गया है कि संविधान की प्रस्तावना पूरे संविधान का आधार है।
    स्वतंत्र भारत के संविधान की प्रस्तावना प्रभावी शब्दों की भूमिका से बनी हुई है। इसमें बुनियादी आदर्श, उद्देश्य और भारत के संविधान की अवधारणा शामिल है। ये संवैधानिक प्रावधानों के लिए तर्कसंगतता या निष्पक्षता प्रदान करते हैं। प्रस्तावना में ही वो सब कुछ निहित है जो भारत के सभी व्यक्तियों को स्वतंत्रता का अनुभव कराती है। "सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य, न्याय, स्वतंत्रता, समता, एकता-अखंडता व बन्धुत्व" शब्द भारत के स्वरूप का निर्धारण तथा उसे परिभाषित करते हैं। प्रस्तावना में संविधान का पूरा सार है। इसलिए कहते हैं कि प्रस्तावना संविधान की आत्मा है।
     वर्तमान समय के राजनीतिक व सामाजिक हालातों में देश के हर व्यक्ति को, बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक, मजदूर - किसान से लेकर कर्मचारी, अधिकारियों, महिलाओं को संविधान की प्रस्तावना को पढ़ने  व समझने की ज्यादा जरूरत है। धार्मिक तथा सामाजिक स्तर पर जिस तरह देश की एकता विखण्डित होती दिख रही है, उसमें  इससे बाहर निकलने की एक आस व शक्ति भारतीय संविधान की प्रस्तावना में नजर आती है। सजग व समझदार लोगों को आगे बढ़कर आमजन तक जाकर प्रस्तावना को बताने व समझाने की जरूरत है। अच्छा तो यही होगा कि प्रत्येक कार्यालय व  घर की मुख्य दीवार पर प्रस्तावना को फ्रेम कर लगाया जाए, उस पर बात की जाए । स्कूल कॉलेज में विद्यार्थियों के साथ संविधान की प्रस्तावना व उसकी मूलभावना पर बातचीत की जाए।  
      भारत के संविधान की उद्देशिका, अपने आप में पूर्ण है। इसमें ईश्वर , इतिहास या पहचान का कोई बोझ नहीं डाला गया है। इसके द्वारा भारत के लोगों से स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय का वादा किया गया है।  भारतीय संविधान की उद्देशिका नागरिकों को यह स्वतंत्रता देती है कि वह अपने कृत्यों, अपनी आस्था, अपने विचारों इत्यादि के सम्बन्ध में उचित चुनाव कर सकते हैं।

     संविधान की उद्देशिका (प्रस्तावना) स्पष्ट रेखांकित करती है कि एक राष्ट्र की एकता, केवल समूहों की एकजुटता भर नहीं है। यह बताती है कि एक वास्तविक एकता तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का आश्वासन दिया जाए।
     संविधान की प्रस्तावना, स्वतंत्रता का एक चार्टर है। इसकी मूलभूत संरचना प्रगतिशील है जो इसे सबसे अलग बनाती है। आवश्यकता इस बात की है कि भारत का प्रत्येक व्यक्ति प्रस्तावना में निहित भावना को समझे व  अंगीकृत करे, उसके प्रकाश में अपना आचरण व व्यवहार करें।
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        - डॉ.अशोक शिरोडे -

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