सियासत का मैदान - नफरत का खेल

*सियासत के मैदान में नफरत का खेल*
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राजनीति का मूल मंत्र है सत्ता और सत्ता तक पहुँचने का सबसे छोटा व आसान रास्ता आज नफरत बन चुका है। जनता को जाती व धर्म के नाम विभाजित कर दो। उन्हें जीवन के मूलभूत सवालों पर सोचने और बात करने का मौका ही मत दो। 
जनता को जोड़ना मुश्किल है, लेकिन तोड़ना आसान है।  इसलिए हर चुनाव से पहले एक नया दुश्मन गढ़ा जाता है। कभी मज़हब के नाम पर, कभी जाति के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर। 

नफरत का खेल सुनियोजित होता है। सोच समझकर योजनाबध्द रूप से इस षडयंत्र  का जाल बुना जाता है। हर चुनाव के पहले एक डर पैदा किया जाता है। बताया जाता है कि फलां समुदाय तुम्हारी नौकरी खा जाएगा, तुम्हारी संस्कृति मिटा देगा, तुम्हारे बच्चों का भविष्य छीन लेगा। भावनात्मक तौर पर मन मे डर पैदा किया जाता है , डर के बाद गुस्सा आता है। गुस्से के बाद भीड़ बनती है। और भीड़ का कोई विवेक नहीं होता। उसकी कोई दिशा नहीं होती। भीड़ में  एक उबाल आता है। नफरत के बहाव में भीड़ बह जाती है। इस बहाव के आवेश में  बिना सोचे समझे बोलती है, वोट देती है , लड़ती है । वह सिर्फ नारे सुनती है और नेता की तरफ देखती है। नेता अपना स्वार्थ साधता है।  जनता को  लड़ता देख नेता अपनी सफलता पर इतराता है।

आज के समय मे सोशल मीडिया ने इस खेल को और खतरनाक बना दिया है। अब झूठ को सच बनाने में मिनट लगते हैं। एक फर्जी वीडियो, एक भड़काऊ पोस्ट, और पूरा शहर जल सकता है। आईटी सेल दिन रात इसी काम में लगे हैं कि कैसे पुराने जख्मों को कुरेदा जाए। इतिहास की किताबों से चुन चुन कर ऐसे पन्ने निकाले जाते हैं जो आज की आग में घी का काम करें।

इस खेल में सबसे बड़ा नुकसान देश का होता है। जब नेता नफरत बाँटते हैं तो विकास पीछे छूट जाता है। स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार की बात कोई नहीं करता। बहस सिर्फ इस बात पर होती है कि कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही। जनता भी इस नशे में ऐसी डूबती है कि वह भूल जाती है कि महंगाई बढ़ रही है, बेरोजगारी चरम पर है।

नफरत बेचने वालों को पता है कि मोहब्बत का बाजार मंदा है। एकता की बात में वह ताकत नहीं जो अलगाव में है। इसलिए हर रैली में एक नया शत्रु खड़ा किया जाता है। जनता को लगता है कि वह अपने धर्म या जाति को बचा रही है, पर असल में वह सिर्फ किसी कुर्सी को बचा रही होती है।

सियासत के इस मैदान में असली हार जनता की ही होती है। क्योंकि नफरत की फसल जब काटी जाती है तो खून किसानों का ही बहता है, सियासतदानों का नहीं। वे तो जीतकर दिल्ली पहुँच जाते हैं और अगली बार के लिए नया मुद्दा तैयार करने लगते हैं।
शहीदे आजम भगतसिंह और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का स्पष्ट मानना था कि जाति और धर्म के नाम पर समाज को नहीं बांटा चाहिए। यह समाज और देश के लिए घातक है।
  इससे साफ है कि जाती और धर्म के नाम लड़ाने वाले लोग  *भगत सिंह और सुभाषचंद्र बोस के विचारों  और  ध्येय के साथ गद्दारी कर रहे हैं।*
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    डॉ. अशोक शिरोडे
        बिलासपुर
     दिनांक। 11/5/2026

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