कविता - शायद शत्रु डर जाए
शायद शत्रु डर जाए
(अशोक शिरोडे)
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हमने
नहीं बांधे तोरणद्वार
अपने
घर के द्वार
हमने
नहीं बनायी
पथ पर कतार
हमने
नहीं थामे
हाथों रंग बिरंगे
पुष्प-गुच्छ हार
हमने
नहीं गाये
स्वागत गीत
आठों पहर घर में
किए हैं व्यतीत
न थी
कार्तिक अमावस की
काली रात
न ही
विजयादशमी की
थी रात
न मिली है विजय
अदृश्य शत्रु पर
किंतु
फिर भी
हमने
आपके कहने पर
जब नभचर
नीरव निद्रा में थे
पेड़-पौधे
मौन मुद्रा में थे
बुझा के घर की
सारी बतियाँ
दीप है जलाएं
उमंग उत्साह में
फटाखे भी फोड़े
आकाशदीप
गगन में उड़ाये
इस आस में
कि
दीपों के प्रकाश से
फटाखों की आवाज से
शायद शत्रु डर जाए
किंतु
कल्पना निराधार रही
आज फिर
संक्रमित मरीजों की
संख्या बढ़ने के
हैं समाचार आये ।।।
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