विवेक सम्मत जनमत ?
2019 का लोकसभा चुनाव अनेक बातो के लिए याद रखा जाएगा। इतिहास में पहली बार पूरा चुनाव व्यक्ति केंद्रित रहा। राजनीतिक दल के बदले मात्र एक व्यक्ति का समर्थन या विरोध के नाम पर देश में चुनाव लड़ा गया। देश के समक्ष खड़ी ज्वलंत समस्याएं व मुद्दे गायब रहे, उनपर किसी ने भी बात नही की ।
आर्थिक व राजनीतिक नीतियों पर बात नहीं की गई। भारतीय इतिहास में पहली बार हमने प्रत्याक्षी नहीं, बल्कि सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव किया है।
निर्वाचन आयोग की भूमिका संदिग्ध रही।
विश्व मे अपनी सक्षम , दमदार, व निष्पक्ष कार्रवाई व व्यवस्थित चुनाव संचालन के लिए जाना गया चुनाव आयोग इस बार लाचार , कमजोर व एकतरफा कार्रवाई के लिए याद किया जाएगा। 7 चरणों के लंबे चुनाव कार्यक्रम के लिए भी इसे याद किया जाएगा।
देश की आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में, जहां बेरोजगारी चरम पर हो, किसान आत्महत्या कर रहे हो, gst ने छोटे व्यापारियों का कारोबार बंद कर दिया हो, नोट बंदी ने आम आदमी को कतार में खड़ा कर दिया , दलितों और आदिवासियों का दामन और शोषण जारी हो, असहमति को राष्ट्रद्रोह बताया जा रहा हो, शहीद करकरे को अपमानित किया जा रहा हो, गांधी के हत्यारे को देशभक्त साबित कर महिमा मंडित किया जा रहा हो ,
इसके बाद भी यदि इस विचारधारा के लोग विशाल बहुमत से चुनाव जीत कर आ रहे है।
इन हालातों में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता बरबस याद आती है:-
यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।
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