दिए के पीछे के प्रश्न और छुपे सच

    प्रकाश के पीछे की मंशा
             (अशोक शिरोडे)
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   हमारे प्रधानमंत्री के निर्देश है कि "हमें प्रकाश के तेज को चारों तरफ फैलाना है"।   इसी का पालन करते हुए आज रात 9 बजे घर की सारी लाइटों को बंद कर 9 मिनट के लिए दीप, मोमबत्ती,टार्च या मोबाइल की फ़्लैश लाइट जलानी है।
    देश मे उत्पन्न किसी भी संकटकाल में नागरिक सदैव अपने नेतृत्व व सरकार के साथ खड़ा होता है। पक्ष व विपक्ष का प्रश्न ही नहीं उठता। अतः लाजिमी है कि जनता प्रधानमंत्री के निर्देशों का पालन करेगी ही किंतु विचारणीय प्रश्न है कि संकट कौन सा है? उसका प्रभाव आमजन पर किस प्रकार का पड़ रहा है? उसके निवारण के उपाय क्या है, व इसके लिए आवश्यक संसाधन कौन से है, इसमें से हमारे पास क्या उपलब्ध है तथा क्या व्यवस्था करना है?
   हम सब भलीभांति जानते कि इस समय देश व पूरा विश्व कोरोना नामक संक्रामक बीमारी से जूझ रहा है। देश मे 21 दिनों का लॉक डाउन है। उद्योग व बाजार बंद होने का सबसे अधिक प्रभाव छोटे काम धंधे में लगे गरीब लोगों पर पड़ा है। देश मे बड़ी संख्या में रोज कमाने खाने वाले असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों की है। उनके सामने जीवन मरण का सवाल खड़ा हो गया है।
   अब पहला प्रश्न यही है कि दीप जलाने, प्रकाश करने से इनके जीवन में आये अंधेरे कैसे दूर होंगे? दूसरा यह कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचना होगा कि प्रकाश करने से कोरोना संक्रमण कम या खत्म हो जायेगा?
   गंभीरता से सोचने पर दोनों ही प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है। पूरे भारत में एक साथ एक समय मे प्रकाश करने से एकजुटता तो दिखेगी किंतु गरीब मजदूर किसानों की हालत में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है। मोदी जी ने अपने संदेश में कहा है कि " जो इस कोरोना संकट में सबसे ज्यादा प्रभावित है , हमारे गरीब भाई बहन , उन्हें कोरोना संकट से पैदा हुई निराशा से आशा की तरफ ले जाना है।" घर से बाहर जिन गांवों व शहरों में ये लोग फंसे हुए हैं वहीं बेहतर रुकने व खाने पीने की व्यवस्था व आर्थिक मदद मिलती तो उन्हें जीने का सहारा मिलता , राहत मिलती तो आशा का संचार होता। शहरों में आसरा न मिलने कारण अपने घर को  कई किलोमीटर पैदल भूखे प्यासे लौटते छोटे बच्चों के साथ महिलाओं व मजदुरों का रेला हम सबने टी वी पर देखा है। कोरोना संक्रमण का तो नहीं किंतु लॉक डाउन का सबसे ज्यादा प्रभाव इन गरीब लोगों पर ही पड़ा है। मोदी जी ने अपने भाषण में उनको जमीनी स्तर पर राहत देने के उपायों पर कोई बात नहीं की।
    दूसरा प्रश्न वैज्ञानिक अवधारणाओं पर है जिसका जबाब अब तक तमाम बुद्धिजीवियों व वैज्ञानिकों ने दे दिया है। दिया जलाने से कोरोना के संक्रमण के कम या खत्म होने की कोई संभावना नहीं है न ही इसका वैज्ञानिक प्रमाण है। साफ है इसका समाधान उचित उपचार व सावधानी ही है। ताली - थाली बजाने, दिया- मोमबत्ती जलाने से कुछ देर के लिए उमंग व उत्साह की अभिव्यक्ति हो सकती है लेकिन यह सार्थक उपाय नहीं है न ही इसका कोई वैज्ञानिक आधार है।
  अब प्रश्न उठता है कि प्रकाश उत्सव करने के पीछे मंशा क्या है? इसे समझने के लिए हमें मोदी जी की की कार्य पद्धति को समझना होगा। मोदी जी समस्या को अवसरों में बदलने में सिद्धस्त हैं। विरोध की किसी भी संभावना पर राष्ट्रीय एकता को दिखा दो, जिससे विरोध के स्वर कम हो जाते हैं। विशेष बात वे उत्सव धर्मी है। नोटबन्दी में उन्होंने राष्ट्रभक्ति का नारा देकर असहमति के स्वर को दबा दिया। लाइन में खड़े होने की तकलीफ सहने , कई लोगों की मौत  होने के बाद भी लोग चुप रहे। जी.एस. टी. लागू किया तो एक देश एक प्रणाली के  विरोध के बाद भी सख्ती से लागू किया फिर भी लोग चुप रहे।  370 व 35 A खत्म करने पर भी जनता चुप रही ,  विश्व मे तेल के दाम कम होने के बाद भी देश मे तेल के दामों में कोई कमी नहीं की गई, मगर जनता आश्चर्यजनक रूप से चुप रही। लेकिन अब जब देश की बड़ी निर्धन आबादी कोरोना संक्रमण से सड़कों पर आ गयी है और उन्हें सिर्फ कोरे आश्वासनों के अलावा कोई ठोस राहत नहीं मिल रही। अतः उनमे उठ रहे असंतोष की भावना को कम करने के लिए यह प्रकाश उत्सव को आयोजित कर राष्ट्रीय भावना को जगा कर  अपनी नाकामी को उसके पीछे छिपाने की यह कोशिश है।
  अपने संबोधन में मोदी जी ने अस्पतालों की व्यवस्था सुधारने , बिस्तर व वेंटिलेटर बढ़ाने,  चिकित्सा कर्मियों के लिए आवश्यक सुरक्षा उपकरण सामग्री की व्यवस्था पर कोई बात नहीं की। ब्लूमबर्ग एजेंसी ने आधिकारिक डेटा का विश्लेषण कर भारत मे सबसे कम कोरोना टेस्ट होने से आबादी में संक्रमण तेज होने की आशंका व्यक्त की है। भारत मे प्रति 10 लाख लोगों पर 66 टेस्ट हो रहे है। अतः टेस्ट बढ़ाने की जरूरत है जिस पर व खामोश है। अभी भी स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर कार्य किये जाने की जरूरत है। देश में अभी संक्रमण का स्तर बढ़ा है। कोरोना पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ी है।
   
    उपरोक्त स्थिति में प्रकाश उत्सव करने की मोदी जी की मंशा पर संदेह उमड़ते हैं। इसके बरअक्स व्यंगकार "हरिशंकर परसाई"  की रचना *टॉर्च बेचने वाला*  याद आती है जिसे रायपुर के इप्टा के निसार अली लगातार विभिन्न शहरों में खेल रहे हैं।
इसमें परसाई जी ने कहा है कि "चाहे कोई दार्शनिक बने, संत बने, साधु बने , अगर वह अंधेरे का डर दिखाता है तो वह जरूर अपनी कंपनी का टॉर्च बेचना चाहता है।"
   आपके यह प्रयास भी इसी को दर्शा रहा है। वक्त के मारे गरीब, भूखे, मजदूर, किसान लोगों को अंधेरे का डर दिखा कर अपनी टॉर्च बेचने की कोशिश कर रहे हैं।
   " लोग तो दीप जलायेंगे,
     भक्ति गीत भी गायेंगे,
     विपत्ति में सरकार के साथ
     कदम से कदम मिलायेंगे
     ताली - थाली भी बजायेंगे
     उमंग से मजमा लगायेंगे
     पेट मे सूरज की आग
     चारों तरफ अंधेरे ही रहेंगे
     भूख की आग में ये लाचार
     सत्ता की नाकामी को भूल जाएंगे।"

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