गांधी व गोडसे- जावेद अख्तर
"... कहीं एक गांधी चल रहा है, कहीं एक गोडसे कत्ल के लिए खड़ा है... लेकिन गोडसे की गोलियां नहीं खत्म होती और गांधी की ज़िंदगी नहीं खत्म होती" जावेद अख्तर को सुनना मतलब अपनी बौद्धिकता के liberal पहलू को एक नया आयाम देना। यूट्यूब ने मुझे जावेद अख्तर की एक तकरीर का शॉर्ट परोसा। इस तकरीर में वे गांधी और गोडसे की तुलना विचारधारा के धरातल पर करते हैं। वे कहते हैं कि गोडसे की विचारधारा का समर्थन करने वाले दिग्गज राजनेताओं को ना चाहते हुए भी गांधी के आगे सर झुकाना पड़ता है। जावेद को पक्का यकीं है कि गॉडसेवादी कभी भी गांधी का कद छोटा नहीं कर पाएंगे। प्रस्तुत है जावेद की तकरीर का एक हिस्सा: "जब एक 80 साल का बूढ़ा एक मैदान पार कर रहा था, सहारा लेके लोगों का, और एक आदमी ने उस बूढ़े आदमी के कमजोर से जिस्म में तीन गोलियां उतार दीं। ये जो आदमी था इसको इस बूढ़े आदमी से नफरत थी क्या? क्या वो उसे मारना चाहता था? या कुछ और मारना चाहता था? उस ख्याल को, उस सोच को, उस ख्वाब को, उस उम्मीद को मारना चाहता थे जिसका नाम गांधी था? लेकिन अरमान और ख्वाब और उम्मीद, उसूल और सच्चाईयां गोलियों से नहीं मरते।...