कविता - शिल्पकार
शिल्पकार
कवि
नहीं होता शिल्पकार
वह तो
होता है कलमकार
शब्दों से खेलना
तोड़ना-मरोड़ना
और
शब्दों का जाल बनाना
जानता है कवि
शिल्प और कला
दोनों से दूर
कलम और कागज में
जीता है कवि
शिल्पकार तो
वह स्त्री - पुरुष हैं
जो अपने
अनमोल पसीनें से
सींचते हैं धरा को
रचते हैं
श्रम का संसार
जीवन के पन्ने पर ।।
* अशोक शिरोडे*
9039940034
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