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कविता - बिटिया की खुशी

बिटिया की खुशी --------------------- बिटिया  जन्म ले जब घर आई  ढेर सारी खुशियां लाई लक्ष्य मिला   जीवन में आस जगी,  बिटिया का  रोना हंसना  घुटनो के बल रेंगना गुड्डे गुड़ियों से खेलना छुपने -  ढूंढने के खेल उसे खेलते देखना अच्छा लगता  मन रम जाता बिटिया पहला कदम जब चली थी  कसकर पकड़ रखा था  पिता की उंगलियों को  उसे पता था  विश्वास था  पापा उसे सम्हाल लेंगे  गिरने नहीं देंगे, बिटिया ने  ककहरा सीखने जब  पहली बार  स्कूल में  रखा था कदम  घबराकर उसने  मजबूती से  पकड़ रखा था पिता की उंगलियों को स्कूल से निकल कर  कॉलेज की समय तक उसने नहीं छोड़ा था  पापा की उंगलियों को जो उसका संबल थी - ताकत  थी एक पल भी  वह न भटकी न ओझल हुआ लक्ष्य उसकी आँखों से एकाग्रचित्त रह सतत अग्रसर रही अपनी तय राहों पे, उसे यह विश्वास था  पिता हर पल  हर मुश्किल में  उसके साथ खड़े हैं, और पिता को बिटिया की समझदारी पर भरोसा था - गर्व था, पता ही नहीं चला  समय पंख लगा  कैसे बीत गय...

संविधान की प्रस्तावना :

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संविधान की प्रस्तावना : पढ़े समझे व पालन करें      -----------------------------------     प्रस्तावना की शुरुआत 'हम भारत के लोग' से शुरू होती है और 'अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित' पर समाप्त होती है।      जब बात भारत के संविधान की होती है तब इसमें सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आता है प्रस्तावना का क्योंकि यही एक चीज़ है जो कि पूरे संविधान की तस्वीर को बयां करती है । सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने एक निर्णय में कहा है  "जब भी कभी संविधान में किसी भी प्रकार का संशोधन होगा और अगर वो प्रस्तावना के उद्देश्य को पूरा नहीं करता तो ऐसे संशोधन को शून्य घोषित किया जा सकता है," इसीलिये  कहा गया है कि संविधान की प्रस्तावना पूरे संविधान का आधार है।     स्वतंत्र भारत के संविधान की प्रस्तावना प्रभावी शब्दों की भूमिका से बनी हुई है। इसमें बुनियादी आदर्श, उद्देश्य और भारत के संविधान की अवधारणा शामिल है। ये संवैधानिक प्रावधानों के लिए तर्कसंगतता या निष्पक्षता प्रदान करते हैं। प्रस्तावना में ही वो सब कुछ निहित है जो भारत के सभी व्यक...

कविता - चीता -2

चीता - 2 -------------- कुनो के जंगल  वैसे ही हैं जैसे  देश के दूसरे जंगल हरे भरे ऊंचे पेड़ पेड़ों के पत्तों की आवाजें चहचहाते पक्षी घने झुरमुटों से  छनकर आती धूप इस जंगल में पशु पक्षी वैसे ही रहते है जैसे दूसरे जंगल में , अंतर सिर्फ  इतना ही आया है अपने आगमन पर दिवस को यादगार बनाने मान्यवर ने  काटकर फीते नामीबिया से लाकर छोड़ दिये हैं चीते, जबसे उनो के जंगल मे  विदेशी चीता आया है उस खुशी में उत्सव मनाया गया है सारे जानवर चुप हैं उन्हें अपने  जल जंगल जमीन  छिनने की आहट  सुनाई दे रही है, जिस तरह  खदानों कारखानों के लिए फर्जी ग्रामसभाओं की  सहमति दिखाकर बिना आम सूचना के  जन सुनवाई को दिखाकर आदिवासियों को   उनके पुरखों की विरासत से बेदखल किया जा रहा है,  सत्ता और चीते के बीच  बना यह गठजोड़  उन्हें भी एक दिन बेदखल करेगा प्रतिरोध करने पर  कलबुर्गी , पानसरे,  गौरी लंकेश की तरह  आवाज को  बन्द कर दिया जाएगा ।। --------------------------------- ---- अशोक शिरोडे ----

कविता - डरपोक तानाशाह ----------------------

डरपोक तानाशाह  ---------------------- यूं तो सभी  किसी न किसी नशे लफड़े में पड़े है नेता अधिकारी सफेदपोश, वर्दीधारी  भ्रष्टाचार के दलदल में पड़े है  उससे बाहर निकलने की  उनकी नहीं है चाहत मंत्री संत्री अपने पदों पर चिपके रहने के फेर में पड़े है सत्ता  के दलाल पूरी ताकत से देश के संस्थान बेचने पर अड़े है देशी अंग्रेज व्यापारी  बाजार कब्जाने में लगे है सियासत साधने सत्ता पाने दिलों में नफरत की ऊंची दीवार उठाने में लगे है सब छोटे या बड़े गड्ढे में पड़े हैं । बस कुछ सिरफिरे लोग हैं जिन्हें नशा है सच कहने सच देखने का जिन्हें नहीं है डर गाड़ी से कुचल दिए जाने का देशद्रोही- आन्दोलनजीवी  या कुछ और कहलाने का जिन्हें फिक्र है देश की  आने वाले नोनिहालो के कल की देश - संविधान  और लोकतंत्र के खातिर कफ़न बांध सर पे  कबीर-गांधी-भगतसिंह  की कठिन राह पर वह चल पड़े है  वे जानते है   लड़ाई मुश्किल है और उन्हें ही  हर मोर्चा लड़ना है  उन्हें अपने होंसलें अपनी जीत का  पूरा यकीन है क्योंकि झूठ फरेब के पैर नहीं होते है दुनिया के...

कविता - मधुशाला

           मधुशाला        ------------------- कोरोना काल मे ... बंद है पाठशाला भीड़ भारी है यहां ... खुली है मधुशाला, पीने पिलाने की ... अब क्या बात करें हाथ धुला रही ... कमबख्त मधुशाला, मंदिर मस्जिद के ... बंद रहे कपाट आबाद होती रही ... नित मधुशाला, न ख़ुशी गम की ... न गम खुशी का दिल को देती दिलासा ... एक मधुशाला, क्या बताये हाल ... मत करो सवाल नए रंग दिखाती ... यह मधुशाला, झगड़े-भेद मिटाती ... अपनो से मिलाती दिल के तार जोड़ती ... एक मधुशाला, देशी हो या विदेशी ... सरूर में कमी नहीं दवा का काम करती ... मस्त मधुशाला  ।।           -------------------------------                   अशोक शिरोडे

कविता - समझती नहीं हो

समझती नहीं हो  --------------------- तुम्हारा दीवाना है..  समझती नहीं हो मन आशिकाना है..  समझती नहीं हो! उलझा हूं कई बार.. जुल्फों के जाल में क्यों है दिल परेशां..  समझती नहीं हो! मैं पास आता गया.. तुम दूर होती गयी स्पर्श का अहसास.. समझती नहीं हो। मुस्काती हो जब.. हवा में आती है ख़ुशबू तराने गाता है दिल.. समझती नहीं हो।।  बसी हो हर श्वांस में.. मिलेंगे मधुमास में समय यूं ही रहा बीत.. समझती नहीं हो। मिलने की चाह में.. खड़े हैं राह में तुमसे ही है जिंदगी.. समझती नहीं हो। श्वांस है जब तक.. आस रहेगी तब तक सच्चे प्रेम का वास्ता.. समझती नहीं हो। अपने प्यार पर .. है एतबार मगर लंबा हुआ इंतजार.. समझती नहीं हो। हम चाहे न रहे.. तुम्हे बेवफा न कहे है यही फिक्र मुझे..  समझती नहीं हो । अपने प्यार के लिए.. प्यार से लिखा है  दिल की व्यग्रता .. समझती नहीं हो।। -------------------//--------------------          अशोक शिरोडे

कविता - चीता

चीता  -------------     चीता   ----------- जंगल का  जानवर है चीता वह नहीं पढ़ता बाईबल - कुरान पोथी पुराण या गीता उसका एक ही धर्म है शिकार के पीछे फुर्ती के साथ  तेज गति से दौड़ना  पलक झपकते शिकार को गरदन से दबोचना  बचने भागने का  मौका दिए बिना काम तमाम करना ..... फिर इत्मिनान से  अपनी फुर्ती, अपनी गति अपनी कुटिलता  अपनी सफलता पर हौले से मुस्कराते 'मन की बात' करना ।। ---------////-----–-----------     अशोक शिरोडे