कविता - समझती नहीं हो

समझती नहीं हो 
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तुम्हारा दीवाना है..  समझती नहीं हो
मन आशिकाना है..  समझती नहीं हो!
उलझा हूं कई बार.. जुल्फों के जाल में
क्यों है दिल परेशां..  समझती नहीं हो!
मैं पास आता गया.. तुम दूर होती गयी
स्पर्श का अहसास.. समझती नहीं हो।
मुस्काती हो जब.. हवा में आती है ख़ुशबू
तराने गाता है दिल.. समझती नहीं हो।। 
बसी हो हर श्वांस में.. मिलेंगे मधुमास में
समय यूं ही रहा बीत.. समझती नहीं हो।
मिलने की चाह में.. खड़े हैं राह में
तुमसे ही है जिंदगी.. समझती नहीं हो।
श्वांस है जब तक.. आस रहेगी तब तक
सच्चे प्रेम का वास्ता.. समझती नहीं हो।
अपने प्यार पर .. है एतबार मगर
लंबा हुआ इंतजार.. समझती नहीं हो।
हम चाहे न रहे.. तुम्हे बेवफा न कहे
है यही फिक्र मुझे..  समझती नहीं हो ।
अपने प्यार के लिए.. प्यार से लिखा है 
दिल की व्यग्रता .. समझती नहीं हो।।
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         अशोक शिरोडे

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