कविता - चीता -2

चीता - 2
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कुनो के जंगल 
वैसे ही हैं जैसे 
देश के दूसरे जंगल
हरे भरे ऊंचे पेड़
पेड़ों के पत्तों की आवाजें
चहचहाते पक्षी
घने झुरमुटों से 
छनकर आती धूप
इस जंगल में पशु पक्षी
वैसे ही रहते है
जैसे दूसरे जंगल में ,
अंतर सिर्फ 
इतना ही आया है
अपने आगमन पर
दिवस को यादगार बनाने
मान्यवर ने 
काटकर फीते
नामीबिया से लाकर
छोड़ दिये हैं चीते,

जबसे
उनो के जंगल मे 
विदेशी चीता आया है
उस खुशी में
उत्सव मनाया गया है
सारे जानवर चुप हैं
उन्हें अपने 
जल जंगल जमीन 
छिनने की आहट 
सुनाई दे रही है,

जिस तरह 
खदानों कारखानों के लिए
फर्जी ग्रामसभाओं की 
सहमति दिखाकर
बिना आम सूचना के 
जन सुनवाई को दिखाकर
आदिवासियों को  
उनके पुरखों की विरासत
से बेदखल किया जा रहा है, 

सत्ता और चीते के बीच 
बना यह गठजोड़ 
उन्हें भी एक दिन बेदखल करेगा
प्रतिरोध करने पर 
कलबुर्गी , पानसरे, 
गौरी लंकेश की तरह 
आवाज को 
बन्द कर दिया जाएगा ।।
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---- अशोक शिरोडे ----

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