कविता - बिटिया की खुशी

बिटिया की खुशी
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बिटिया 
जन्म ले
जब घर आई 
ढेर सारी खुशियां लाई
लक्ष्य मिला  
जीवन में आस जगी, 

बिटिया का 
रोना हंसना 
घुटनो के बल रेंगना
गुड्डे गुड़ियों से खेलना
छुपने -  ढूंढने के खेल
उसे खेलते देखना
अच्छा लगता 
मन रम जाता

बिटिया
पहला कदम जब चली थी 
कसकर पकड़ रखा था 
पिता की उंगलियों को 
उसे पता था 
विश्वास था 
पापा उसे
सम्हाल लेंगे 
गिरने नहीं देंगे,

बिटिया ने 
ककहरा सीखने जब 
पहली बार 
स्कूल में 
रखा था कदम 
घबराकर उसने 
मजबूती से 
पकड़ रखा था
पिता की उंगलियों को
स्कूल से निकल कर 
कॉलेज की समय तक
उसने नहीं छोड़ा था 
पापा की उंगलियों को
जो उसका
संबल थी - ताकत  थी
एक पल भी 
वह न भटकी
न ओझल हुआ
लक्ष्य उसकी आँखों से
एकाग्रचित्त रह
सतत अग्रसर रही
अपनी तय राहों पे,

उसे यह विश्वास था 
पिता हर पल 
हर मुश्किल में 
उसके साथ खड़े हैं,
और पिता को
बिटिया की समझदारी पर
भरोसा था - गर्व था,

पता ही नहीं चला 
समय पंख लगा 
कैसे बीत गया
बिटिया कब बड़ी हो गई
अपने पैरों पर खड़ी हो गई
अपने रास्ते खुद चुनने लगी
फैसले सारे खुद करने लगी,

उसका 
बड़ा होना अच्छा है 
आखिर
एक दिन तो उसे 
बड़ा होना ही था 
खुद के पैरों पर 
खड़ा होना ही था
जीवन पथ पर
अकेले बढ़ना ही था
अब तक पकड़ी
उन उंगलियों को
एक समय छोड़ना ही था,

उसके आने वाले 
कल की सोचकर
चिंता अब भी होती है
जो रास्ता उसने चुना है 
वह नया है अंजाना है
मां उसके लिए रोती है,
उससे कहना 
हमें एक बात है 
हम सब सदा
उसके साथ हैं, 

उसकी खुशी में
हमारी खुशी है 
यही हम बताना चाहते हैं 
संजीदगी से हम 
अभिभावक का दायित्व 
निभाना चाहते हैं।।
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अशोक शिरोडे

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