कविता 'राम'

प्रेम करने वाले राम के बदले 
धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाए राम को 
तुम ही लाये हो 

कुकृत्यों को तुम्हारे
देख जब राम रौद्र हुए
तुम बौखलाये हो
 
मर्यादा पुरुषोत्तम राम को
विस्थापित कर 
युद्ध के लिए आतुर
राम को तुमने ही गढ़ा है
शोषित पीड़ित जन की
व्यथा जान, कुपित राम
जन के पथ पर बढ़ा है
सड़क से संसद तक 
राम का यह रूप देख
तुम झल्लाये हो।

समय आ गया है जब
मदमस्त अभिमानी राजा को
सिंहासन से उतारा जाएगा
मायावी रूप धर ठगता है जो
उसका असली रूप दिखाया जाएगा
लंका अब ढहायी जाएगी
राम का तिलक किया जाएगा,
ज्ञान नहीं है तुमको मगर
यह दशा तुम ही लाये हो।

( R - राहुल
  A - अखिलेश
  M - महुआ )
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   डॉ. अशोक शिरोडे


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