आलेख धार्यते इति धर्म: ( अशोक शिरोडे)

धार्यते इति धर्म:
                   ( अशोक शिरोडे)
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धर्म शब्द का मूल धातु ध है। 
धर्म की अनेक परिभाषाएं बताई जाती हैं। 
धर्म, धारण करने को कहते हैं अर्थात जिसे धारण किया जाए वह धर्म है। 

 मनुष्य के रूप में हम जिन बातों को धारण कर सकते हैं वही धर्म है। जैसे सत्य बोलने, दूसरों के लिए प्रेम भाव रखना,    जरूरत मंद की सहायता के लिए तत्पर रहना आदि।

दूसरा जिस वस्तु,  पदार्थ का जो मौलिक गुण है उस गुण का पालन करना उसका धर्म है। जैसे नदी का प्रवाहित रहना, सूर्य का प्रकाशित होना, ऊष्मा देना आदि।
वस्तुतः मनुष्य के क्रमशः सामाजिक विकास के साथ उस समूह की एक जैसे रहन सहन की जीवन पद्धति जिसे दीर्घ समय पश्चात संस्कार के रूप में परिभाषित किया जाता है। समाज व राज्य के अवधारणा के साथ ही यह संस्कार धर्म के रूप में स्थापित हो जाता है। तत्पश्चात  वेशभूषा, बोली, भाषा सहित अन्य पहचान के चिन्ह को ही सामान्य रूप से धर्म के रूप में लिया जाता है।
अर्थात अब धर्म एक समूह  विशेष को एकजुट कर एक नियम विशेष के अधीन रहने व जीवन यापन के  पर्याय के रूप में स्थापित हो जाता है और धर्म एक संस्थागत  रूप में शक्ति प्राप्त कर लेता है। यह शक्ति अब व्यक्ति व समाज को बदलते समय के बाद भी पुरानी मान्यताओं, रूढ़ियों, परंपराओं, कर्मकांडो का पालन के लिए बाध्य करती है।

धर्म का धारण बाहर से होता है। जो भी चीज बाहर से धारण की जाती है वह बाहरी चेहरा मात्र है। यही कारण है कि धार्मिक आदमी के दो चेहरे होते हैं। एक बाहरी चेहरा और एक उसका अपना चेहरा। दोनों में मेल स्थापित करने को आप अध्यात्म कह सकते हैं लेकिन वास्तव में अध्यात्म यह नही है। अध्यात्म का अर्थ है अधि आत्म। और यह भीतर से पैदा होने वाला गुण है। 

यह आम धारणा है कि धार्मिक व्यक्ति ही आध्यात्मिक होता है। लेकिन देखने मे बार बार यह आता है कि जिसमे मनुष्य होने के गुण हैं वही आध्यात्मिक होगा। इसमें धार्मिक या अधार्मिक होना महत्वपूर्ण नहीं है। धार्मिक लोग क्योंकि धार्मिक नियम और धार्मिक सोच से संचालित होते हैं इसलिए उनकी अपनी निजी सोच बचती ही नही। और जब आप की सोच ही अपनी नहीं तो आत्म पर अधिकार यानी आध्यात्मिक होने की यात्रा से तो आप दूर ही जा रहे हैं। 

अधार्मिक लेकिन मनुष्यता का बोध रखने वाला व्यक्ति अध्यात्म के नजदीक जाता है। क्योंकि वह हर धर्म के इंसान में मनुष्यता का बोध देखता है । वस्तुतः मनुष्य होने का बोध जिसमें होगा वह मनुष्य के मौलिक गुण प्रेम को धारण करेगा। प्राणिजगत के प्रति संवेदनशील होगा। वह एक सुंदर भेदभाव रहित समाज के निर्माण का प्रयत्न करेगा। एक बेहतर मनुष्य बनने के लिए धार्मिकता के आवरण की आवश्यकता नहीं होती है अपितु नित्य दैनिक जीवन में उच्च आदर्शो का पालन करना होता है, वह भी बिना किसी भय या अपेक्षा के। अधार्मिक व्यक्ति का अपने ऊपर विश्वास होता है। वह प्रत्येक कार्य के परिणाम का दायित्व अपने ऊपर लेता है। मूलतः वह कर्मवादी होता है। इसलिये  वह निर्भीक होकर  दृढ़ता के साथ सत्य के पक्ष में खड़ा होता है। उसमें प्रेम संवेदनशीलता के गुण के साथ सहमति का विवेक व असहमति का साहस होता है।

डुबकी लगाना, कर्मकांड करना, माला कंठी धारण करना ये सब धार्मिक होने के आवरण हैं।  हमारा असल तो आवरण के नीचे है ।

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