बच्चे और समय
समय और बच्चे
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अपने प्राणों से ज्यादा
प्रिय होते हैं अपने बच्चे
बच्चों ने जैसा चाहा
वैसा ही मां बाप ने किया
कभी हाथी कभी घोड़ा बन
पीठ पर उसे घुमाया
ना ना स्वांग रचा
उनका मन बहलाया
हाथों को झूला बना
उनका मन भरने तक
झूला झुलाया
बच्चों के साथ
बड़े भी
बच्चे बन जाते है
हंसते - खेलते
मस्ती करते
उम्र को भूल जाते है
और
खेल खेल में
समय गुजरते
देर नहीं लगती
बच्चे
जब बड़े हो जाते हैं
रास्ते उनके
अलग हो जाते हैं
व्यग्रता व आवेश के
वशीभूत हो
अपनी सोच समझ को
सही मानते है
उम्र व अनुभव की आंख
उनके नहीं होती
न ही दूर तक देखते हैं,
माता पिता क्या सोचते हैं
क्या चाहते हैं
इससे क्या फर्क पड़ता है
वक्त का रिवाज है
हर मां बाप को
यह समय देखना पड़ता है
अपनी उम्मीदों को
दफन करना पड़ता है।।
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