कविता - तानाशाह डरपोक होता है

हर मोर्चा लड़ना है
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यूं तो सभी 
किसी न किसी नशे लफड़े में पड़े है
नेता अधिकारी
सफेदपोश, वर्दीधारी 
भ्रष्टाचार के दलदल में पड़े है 
उससे बाहर निकलने की 
उनकी नहीं है चाहत
मंत्री संत्री अपने पदों पर
चिपके रहने के फेर में पड़े है
सत्ता  के दलाल पूरी ताकत से
देश के संस्थान बेचने पर अड़े है
देशी अंग्रेज व्यापारी 
बाजार कब्जाने में लगे है
सियासत साधने सत्ता पाने
दिलों में नफरत की
ऊंची दीवार उठाने में लगे है
सब छोटे या बड़े गड्ढे में पड़े हैं ।

बस कुछ सिरफिरे लोग हैं
जिन्हें नशा है
सच कहने सच देखने का
जिन्हें नहीं है डर
गाड़ी से कुचल दिए जाने का
देशद्रोही- आन्दोलनजीवी 
या कुछ और कहलाने का
जिन्हें फिक्र है देश की 
आने वाले नोनिहालो के कल की
देश - संविधान 
और लोकतंत्र के खातिर
कफ़न बांध सर पे 
कबीर-गांधी-भगतसिंह  की
कठिन राह पर वह चल पड़े है 
वे जानते है  
लड़ाई मुश्किल है और
उन्हें ही 
हर मोर्चा लड़ना है 
उन्हें अपने होंसलें
अपनी जीत का 
पूरा यकीन है
क्योंकि
झूठ फरेब के पैर नहीं होते है
दुनिया के 
हर तानाशाह 
भीतर से डरपोक होते है।।
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   - अशोक शिरोडे -

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