राम राम से जय श्रीराम की यात्रा

"राम राम" से "जय श्रीराम" की यात्रा
शब्द के भाव व संदेश बदल गए हैं
          - अशोक शिरोडे -
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       भारतीय संस्कृति में "राम" नाम का महत्व निर्विवाद है। भारतीय जनजीवन में राम हर हृदय में बसे हैं। दिन के प्रारंभ से लेकर रात के विश्राम तक राम शब्द का उच्चारण बराबर किया जाता है। राम के विम्ब चित्र के बिना भी प्रतिदिन राम का नाम लिया जाता है।
      सभी जगह विशेषकर गांवों में एक दूसरे को "राम राम" बोलकर अभिवादन किया जाता रहा है। बच्चों से लेकर बुजूर्ग द्वारा दिन की शुरुआत ही राम राम कर की जाती है। दूर से आये मेहमान का अभिवादन भी सम्मान के साथ  "राम राम" कर किया जाता रहा है। सोशल मीडिया के आज के दौर के पहले जब पत्र लिखने का चलन रहा है तब भी पत्र की शुरुआत  ही राम राम  से होती थी।
ग्रामीण क्षेत्रों में एक व्यक्तिघर के बाहर से जोर से आवाज देकर राम राम करता है और अंदर से भी राम राम कर प्रति उत्तर दिया जाता है। गांव में कोई अपरिचित नए व्यक्ति के आगमन पर राम राम कह कर बातचीत करने की परंपरा रही है। इस "राम राम" कहने की परंपरा, चलन में प्रेम, अपनत्व झलकता है, अनुभव होता है। यह राम निश्छल रूप से एक दूसरे को  जोड़ने वाला राम है, एक से दूसरे हृदय की गहराई में उतरने वाला राम है। इसमें  महत्वपूर्ण  यह भी रहा कि  यह अभिवादन सभी जाति व धर्म के  लोग प्रेम से करते हैं, इसमें कभी किसी को आपत्ति नहीं हुई तथा न ही इसमें अनुचित गर्व दिखलाकर किसी को अपमानित करने का भाव रहा है।
      भारत के विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों में उनकी अपनी स्थानीय परंपरा रही है किंतु राम सब जगह सरल व सहज रूप में उपस्थित है। उनकी बोली भाषा में रचे बसे राम प्रेम , स्नेह , करुणा के राम हैं। "जय सीताराम जी" की, "जय सियाराम जी" की, या "जय राम जी" की, अभिवादन के शब्द रहे हैं।
यह राम शबरी के झूठे बेर खाने वाले, वनवास में निर्बल व पीड़ित सुग्रीव से मित्रता का व्यवहार  करने व सम्मान देने वाले राम हैं। रावण के भाई विभीषण  से कटुता बैर न रख सम्मान का स्थान देने वाले मानवता के राम हैं। जगत के प्रत्येक प्राणी से प्रेम करने वाले राम हैं। ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम की अदभुत महिमा, प्रतिमा भारत के लोगों के अंर्तमन में बसी हुई है। 
      किन्तु विगत कुछ समय से देखने में में आ रहा कि जनमानस का यह प्रिय स्नेहमयी राम कहीं खो गया है, उसे विस्थापित कर धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाए राम को स्थापित किया जा रहा है। "जय श्री राम" का उदघोष जगह जगह किया जा रहा है। यह दम्भपूर्ण उदघोष कर द्वेष व वैमनस्यता को रोपने व फैलाने का काम किया जा रहा है। "राम राम" व "जय सीताराम जी" योजनाबद्ध रूप से राजनीतिक नारे  "जय श्री राम" में बदल गया, और जनमानस विशेषकर युवा पीढ़ी इसमें बह गई। विगत समय मे घटी घटनाएं यह बताती है कि युवा पीढ़ी को इस नारे के साथ कुछ भी करने की स्वतंत्रता मिल गयी है।
       वाल्मीकि के राम व तुलसीदास के राम में आम जनता के करुणामयी राम के दर्शन होते हैं। गांधी के राम, पतितपावन सीताराम है, सभी व धर्मों के राम है। कबीर के राम समाज के आदर्श राम है, निर्गुण राम है। उनके राम तो ढाई आखर प्रेम में समाए राम हैं, विश्वव्यापी राम हैं। इनके प्रेम मयी राम से किसी को डर नहीं लगता है। एक तरफ लक्ष्मण व दूसरी तरफ सीता जी के साथ खड़े करुणामूर्ति राम अनेको वर्षों से हमारी संस्कृति के वाहक है। जिन्होंने सभी भारतीयों को एक सूत्र में पिरो के रखा है। सर्व साधारण सबके चिंतक रक्षक राम के राज्य अर्थात रामराज्य की अपेक्षा  करता है।
     इसके विपरीत जब धैर्यवान, संवेदनशील वास्तविक राम को भुलाकर प्रत्यंचा खींचे लड़ने के लिए आतुर राम सामने आते हैं तब भय लगता है, चिंता होती है। शालीनता व मर्यादा के पर्याय सीताराम को यह कैसा रूप धराया जा रहा है, उसे महिमा मंडित किया जा रहा है!
धर्म के मर्म को समझने वाले, राम के विचार व्यक्तित्व का गहनता से अध्ययन करने वाले लोग व्याकुलता पूर्वक कह व समझ रहे हैं- हमारा राम तो " राम राम " "जय सियाराम" "जय रामजी", में बसते हैं।
      आइए फिर हम अपनी संस्कृति को जीवित  करें, अपने प्रेममयी व संवेदनशील राम को खोजें, अपने वास्तविक राम की और चलें।  संत कबीर के, तुलसीदास के, गांधी के राम को  न्याय दे।    
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