प्रेमचंद: किसान और उसका संघर्ष

प्रेमचंद: किसान और उसका संघर्ष
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"न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं। इन्हें वह जैसा चाहती है नचाती है।"
     -- मुंशी प्रेमचंद-
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प्रेमचंद की रचना की भाषा किसान-चेतना और संघर्ष की भाषा है। उन्हें समझौते की भाषा में तनिक विश्वास न था। वे आन्दोलन के दौर के लेखक थे। यह अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ एक व्यापक जनांदोलन का दौर था। प्रेमचंद इस दौर के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। 
जब 1930 के हिंदुस्तान में जी रहे प्रेमचंद को अपने समय की स्थितियों को समझने और उनके समाधान के लिए साहित्य की आवश्यकता महसूस हुई, तो आज आज़ादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद भी जबकि परिस्थितियां कमोबेश वहीं हैं, तो साहित्य और समाज के संबंध कैसे कमज़ोर हो सकते हैं? क्योंकि जिस सांप्रदायिक वातावरण, किसानों के शोषण व दयनीय स्थिति, जातिवाद पर अपनी चिंता प्रेमचंद 1930 में ज़ाहिर कर रहे थे, वो माहौल तो आज भी ज्यों-का-त्यों बना हुआ है.
भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद का इतिहास असंतोष और उसके प्रतिकार के लिए विश्व-प्रसिद्ध है। खासकर किसानों एवं मजदूरों के आंदोलन का एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। प्रेमचंद एक औसत दर्जे के किसान परिवार से आए थे। उनकी इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने भारत में चल रहे तत्कालीन किसान आंदोलन को समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। किसानों की तंग जिंदगी से भलीभांति अवगत होने के कारण प्रेमचंद ने इसे अपनी रचनाओं का मुख्य विषय बनाया।
 प्रेमचंद का स्वराज्य किसानों का सुराज था। अपने स्वराज्य को स्पष्ट करते हुए प्रेमचंद ने 1930 के हंस में लिखा था, ‘कुछ लोग स्वराज्य से इसलिए घबड़ा रहे हैं कि इससे उनके हितों की हत्या हो जाएगी। और इस भय के कारण या तो दूर से इस संग्राम का तमाशा देख रहे हैं या जिन्हें अपनी प्रभुता ज्यादा प्यारी है वे परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सरकार का साथ देने पर आमादा हैं। इनमें अधिकांश हमारे जमींदार, सरकारी नौकर, बड़े-बड़े व्यापारी और रुपये वाले लोग शामिल हैं। उन्हें भय है कि अगर यह आंदोलन सफल हो गया तो जमींदारी छिन जायगी, नौकरी से अलग कर दिये जाएंगे, धन जब्त कर लिया जायगा।’ आगे फिर लिखा है, ‘हर एक आंदोलन में गरीब लोग ही आगे बढ़ते हैं यह भी अमर सत्य है। इस आंदोलन में गरीब ही आगे-आगे हैं और उन्हीं को रहना भी चाहिए, क्योंकि स्वराज्य से सबसे ज्यादा फायदा उन्हीं को होगा भी…।
प्रेमचंद  जानते थे किसान  वर्ग जब कभी भी अपनी मांगों को लेकर संगठित होना चाहते है तो उन्हें तोड़ने की साजिश रची जाती है।  अप्रेल 1930 के हंस में ये बातें देखी जा सकती हैं …‘मगर किसानों का कोई संघ नहीं है। उनकी शक्ति बिखरी हुई है। अगर उन्हें संगठित करने की कोशिश की जाती है तो सरकार, जमींदार, सरकारी मुलाजिम और महाजन सभी भन्ना उठते हैं। चारों ओर से हाय-हाय मच जाती है। बोलशेविज्म का हौवा बताकर उस आंदोलन को जड़ से खोदकर फेंक दिया जाता है।’ 
यही हाल आज भी है बल्कि यह कहा है सकता है कि अंग्रेजो के राज्य से ज्यादा दमनकारी सत्ता आज है।  जमीन, किसानी, और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे किसानों को जिसमें नवयुवाओं , महिलाओं के साथ बुजुर्ग  शामिल है उनको राष्ट्रद्रोही, आतंकवादी बताया जा रहा है। उनके आंदोलन को तोड़ने, असफ़ल करने, कुचलने के लिए सत्ता द्वारा तमाम षड्यंत्र किये जा रहे हैं। आजादी के बाद का यह किसान आंदोलन नई इबारत लिख रहा है।
प्रेमचंद ने जो साहित्य आज से लगभग 90 वर्ष पूर्व लिखा वह आज के सामाजिक,  आर्थिक राजनीतिक, धार्मिक हालातों को प्रमाणिकता के साथ व्यक्त करता है। जाति  धर्म  के नाम पर जनता में द्वेष पैदा कर आपसी भाईचारे की भावना को खत्म किया जा रहा है। फादर स्टेन स्वामी, जनकवि वरवरा राव जो उम्र की उस दहलीज पर है जहां चलना तो दूर अपने हाथों से पानी भी नहीं पी सकते, उन्हें राष्ट्र विरोधी कार्यों के आरोपों में जेलों में बंद रखना सरकार की नीयत को दर्शाता है।
संगठित पूंजीपति शोषकों के नए अवतार सामने आ रहे है, उन्हें व्यापार करने लिए सारे बाजार को उनके हाथों सौंप दिया जा रहा है। तथाकथित तीनों कृषि कानूनों को इसी पृष्ठभूमि में समझने की जरूरत है। प्रेमचंद अगर आज होते तो निश्चित ही इन कानूनों के खिलाफ लिखते व जनता, किसान के साथ खड़े होते। प्रेमचन्द इस बात को लेकर बिल्कुल ही साफ थे कि राष्ट्रीय उन्नति के लिए किसानों-मजदूरों का विकास बहुत आवश्यक है। अपनी इसी विचारधारा के तहत वे किसानों के पक्ष में खड़े होते हैं । 
सामाजिक स्वाधीनता से प्रेमचन्द का तात्पर्य  सांप्रदायवाद, जातिवाद, छूआछूत और स्त्रियों की स्वाधीनता से भी था. उनकी रचनाओं पर नज़र डालें तो उसमें ज़मींदार के ख़िलाफ़ ग़रीब किसानों की लड़ाई है. जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ और दबे कुचले लोगों की लड़ाई है. तो  इस अर्थ में वे स्वाधीनता को परिभाषित करते थे और इसलिए उनकी प्रगतिशीलता का जो आधार था उसे बहुत बुनियादी  क्राँतिकारी कहना चाहिए।
कर्मभूमि के सलीम के शब्दों में, ‘मुझे खौफ है कोई हंगामा न हो जाय। अपने हक के लिए या बेजा जुल्म के खिलाफ रिआया जोश में हो, तो मैं इसे बुरा नहीं समझता, लेकिन यह लोग कायदे कानून के अंदर रहेंगे, मुझे इसमें शक है।’

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अशोक शिरोडे
सहसचिव 
प्रगतिशील लेखक संघ
बिलासपुर

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