कविता- जुमलों से फैलाते भ्रम

एक देश एक भाषा
एक निशान
जिये या मरे
मजदूर किसान ,
एक जी एस टी
एक बाजार
चाहे रहे लाखों
युवा बेरोजगार,
मंडी समिति खत्म
किसान स्वतंत्र
नोचने खसोटने
साहूकार भी स्वतंत्र, 
सरकार कहे
आत्मनिर्भर बने
चौराहे पर चाय बेचें 
या पकोड़े तलें ,
स्वदेशी बिन बजा
बेच डाले सारे
सार्वजनिक उपक्रम
नित नए जुमलों से
जन मन में 
फैलाते हैं भ्रम ।।
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अशोक शिरोडे

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