शहीद भगत सिंह व क्रांतिकारी कवि पाश

शहीद भगत सिंह व क्रांतिकारी कवि पाश
दोनों की चिन्तन में रहा सर्वहारा वर्ग  
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"मेरी भावनाएं मेरी कलम से इस तरह रूबरू है अगर मैं इश्क लिखना चाहूं तो हमेशा इंकलाब लिखा जाता है।"
व्यक्ति को कुचलकर मार सकते हैं लेकिन उसके विचारों को नहीं मार सकते।"
                      - भगत सिंह
सबसे खतरनाक होता है/ सपनों का मर जाना / न होना दर्द का / सब कुछ सहन कर जाना / सबसे खतरनाक वे आंखे होती है/ जो सबकुछ देखते हुए भी जमा हुआ बर्फ होती है।" 
            - अवतार सिंह संधू "पाश"


23 मार्च शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का शहादत दिवस है। इन तीन नौजवान क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। इस घटना के 57 साल बाद 23 मार्च 1988 को पंजाब के प्रसिद्ध क्रांतिकारी कवि अवतार सिहं "पाश" को आतंकवादियों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया। 1970 वाले दशक में पंजाब में जो क्रांतिेकारी आंदोलन शुरू हुआ, उसके पक्ष में कविताएं लिखने के कारण भी पाश कई बार जेल गये थे, सरकारी जुल्म के शिकार हुए तथा वर्षों तक भूमिगत रहे।
यह महज संयोग है कि पंजाब की धरती से पैदा हुए क्रांतिकारी भगत सिंह के शहीदी दिवस के दिन ही अर्थात 23 मार्च को पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिहं पाश भी शहीद होते हैं। लेकिन इन दोनों क्रांतिकारियों के उददेश्य व विचारों की एकता कोई संयोग नहीं है। यह वास्तव में भारतीय जनता की सच्ची आजादी के संघर्ष की क्रांतिकारी परंपरा का न सिर्फ सबसे बेहतरीन विकास है बल्कि राजनीति और संस्कृति की एकता का सबसे अनूठा उदाहरण भी है।
आज देश में जिस तरह का माहौल है उसमें भगत सिंह याद बरबस आ जाती है। उन जैसे क्रांतिकारी अग्रदूत की आज जरूरत महसूस होने लगी है। युवा शक्ति भटकाव के रास्ते पर है। देश को अपने मूल विचारों से किनारा करने के लिए विचारकों, साहित्यकार,  सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और ऊर्जावान विद्यार्थियों पर साजिशन हमले हो रहे हैं। साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने और संविधान-विरोधी गतिविधियों को सरकार का कथित संरक्षण प्राप्त हो रहा है। झूठ बोलने का एक अजीब दौर है। प्रगतिशील विचारों को खत्म करने का सिलसिला जारी है। धर्मान्धता और आडम्बरों के जाल में जनमानस को उलझाया जा रहा है।

  भगत सिंह और पाश के बीच कई समानताएं हैं। दोनों की मृत्यु का दिन (23 मार्च) एक ही है और दोनों सितंबर के महीने में ही पैदा भी हुए थे। वो कहते हैं जिस दिन भगत सिंह को फांसी दी जानी थी उस दिन वो लेनिन की किताब पढ़ रहे थे, पढ़ते हुए उन्होंने किताब के पन्ने को मोड़ कर रख दिया था। इस बात का ज़िक्र पाश अपनी कविता में करते हैं और कहते हैं "भगत सिंह ने शहादत से पहले किताब के जिस पन्ने को मोड़ा था" पंजाब के युवाओं को उसके आगे पढ़ने की ज़रूरत है। अपने आदर्श भगत सिंह की शहादत पर पाश अपनी कविता 23 मार्च में लिखते हैं  *शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था, ईश्वर की तरह लेकिन ईश्वर की तरह निस्तेज़ न था।*
भगत सिंह लेनिन को अपना आदर्श मानते थे और पाश भगत सिंह को। दोनों में एक और समानता हैं वो कहते हैं *दोनों की मृत्यु फासिस्टों द्वारा ही की गई, एक तरफ भगत सिंह को ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता ने मारा तो पाश को खालिस्तानी फासिज़्म ने। 
शहीद भगतसिंह ने फाँसी पर चढ़ने से कुछ समय पहले कहा था * जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रुरत होती है अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इंसान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रांति की स्पिरिट ताज़ा की जाए] ताकि इंसानियत की रूह में एक हरकत पैदा हो।*
भगतसिंह जब यह कह रहे थे तो वे इतिहास के सिद्धांतों की गहरी भावना को समझते हुए] अपने समय के बहुत आगे के भविष्य के लिए एक अहम् संदेश दे रहे थे। (भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज)

कवि पाश
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"सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना"
पंजाब के जालंधर ज़िले के तलवंडी सलेम गांव में 9 सितंबर 1950 को जन्मे अवतार सिंह संधू उर्फ पाश अपनी क्रांतिकारी कविताओं को रचने और व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाले कवि के रूप में जाने जाते हैं। कम उम्र से ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी। उनकी रचनाओं में इसका प्रभाव साफ झलकता हुआ दिखाई पड़ता है।

पाश अपनी एक कविता *मैं घास हूं* में लिखते हैं, *मैं आपके हर किए धरे पर उग आऊंगा*  इस कविता के जरिए वह सत्ता व्यवस्था को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं और बड़ी ठसक से कहना चाहते हैं कि एक नागरिक को अगर सत्ता मिटाना चाहेगी तो वो सफल नहीं हो पाएगी, नई मांगों के साथ जनता फिर से आवाज़ बुलंद करेगी।

पाश की सबसे प्रसिद्ध कविता *सबसे खतरनाक* पढ़ते हुए आप महसूस कर सकते हैं कि उस रचना में गढ़े गए शब्दों का अनुभव संसार काफी व्यापक है। पाश सामाजिक बुराइयों पर मनुष्य की चुप्पी को सबसे खतरनाक बताते हैं। पाश उस चांद को सबसे खतरनाक बताते हैं जो हर हत्याकांड के बाद वीरान हुए आंगन में चढ़ जाता है।
लोकतंत्र की असल खूबसूरती सहमतियों और असहमतियों के बीच होते द्वंद में है। इन्हीं द्वंदों को मज़बूत पाश की जन-चैतन्य कविताएं बनाती हैं। सड़क का संघर्ष हो, गरीबों-किसानों की इच्छा हो या आंदोलनों को स्वर देने का काम हो, सभी को अपनी कविताओं में रचते हुए पाश दिखाई पड़ते हैं]
उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई कविता **हम लड़ेंगे साथी** सर्वहारा के संघर्ष की बानगी है। जिसमें अन्याय, शोषण के खिलाफ और अधिकारों को पाने के लिए जूझते रहने और लड़ते रहने का आह्वान है। कई आंदोलनों में इस कविता को गाया भी जाता है।
पाश अपनी कविता *भारत* में राष्ट्र के असल मायने को समझाते हैं। वे कहते हैं, **जब भी कोई राष्ट्रीय एकता की बात करता है तो मेरा दिल चाहता है उनकी टोपी उछाल दूं। उसे बताऊं भारत का अर्थ दुष्यंत से नहीं बल्कि यहां के खेतों से है, जहां अन्न उगता है। पाश ने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया बल्कि हजारों दलित, पीड़ित, शोषित कंठों से निकली आवाज को अपनी कविता में पिरोते रहेए रचते रहेए उनका गीत गाते रहे और अपने प्रिय शहीद भगत सिंह की राह पर चलते हुए शहीद हो गये।
23 मार्च के दिन ही अपना खून बहाकर पाश ने राजनीति और संस्कृति के बीच खडी की जाने वाली दीवार को ढहाते हुए यह साबित कर दिया कि बेहतर जीवन मूल्यों व शोषण उत्पीड़न से मुक्त मानव समाज की रचना के संघर्ष में कवि व कलाकार भी उसी तरह का योद्धा है जिस तरह एक राजनीतिककर्मी या राजनीतिक कार्यकर्तां। राजनीति और संस्कृति को एकरूप करते हुए पाश ने यह प्रमाणित कर दिया कि अपनी विशिष्टता के बावजूद मानव समाज के संघर्ष में राजनीति और संस्कृति को अलगाया नहीं जा सकता बल्कि इनकी सक्रिय व जन पक्षधर भूमिका संघर्ष को न सिर्फ नया आवेग प्रदान करती है बल्कि उसे बहुआयामी भी बनाती है।
भगत सिंह मूलत एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे। राजनीति उनका मुख्य क्षेत्र था। लेकिन उन्होंने तमाम सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक सवालों पर भी अपनी सटीक टिप्पणी पेश की थी। अपने दौर में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों, देशी विदेशी प्रतिक्रियावादी शाक्तियों व विचारों, धार्मिक कठमुल्लावादी, सांप्रदायिकता, अस्पृश्यता, जातिवाद जैसे मानव विरोधी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष करते हुए भगत सिंह ने जनवादी, समाजवादी विचारों को प्रतिष्ठित किया। पाश की कविता, विचारधारा, पत्रकारिता व सांस्कृतिक सक्रियता से साफ पता चलता है कि उनकी राजनीतिक समझ बहुत स्पष्ट थी।
यही भगत सिंह और पाश की समानता है। भले ही इनकी शहादत के बीच 57 वर्षों का अंतर है। ये दोनों क्रांतिकारी योद्धा राजनीति और संस्कृति की दुनिया को बहुत गहरे प्रभावित करते है साथ ही ये राजनीति और संस्कृति की एकता, भारत की धर्मनिरपेक्ष] जनवादी व क्रांतिकारी परंपरा के उत्कृष्ट वाहक हैं तथा अपनी शहादत से ये राजनीति और संस्कृति की एकता में नया रंग भरते हैं।

भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू और अवतार सिंह संधू उर्फ पाश के शहादत दिवस (23 मार्च) पर सभी ज्ञात - अज्ञात शहीदों का स्मरण सादर नमन है।
                       -  अशोक शिरोडे - 

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