कविता - तुम्हारी प्रतीक्षा में

प्रियतमा के लिए मेरी कवितामय भावना
तुम्हारी प्रतीक्षा में
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तेरा और मेरा मकसद
एक ही था
तेरा और मेरा लक्ष्य
एक  ही था

उस तक तक पहुंचने
के तमाम रास्ते -
कच्चे-पक्के, पथरीले
टेढ़े मेढे घुमावदार
फिसलन भरे,
जंगल पहाड़ से
पगडंडियों से
खेतों की मेढ़ से
पुलविहीन नदी नालों से
होकर गुजरते थे,

हम चाहे जहां से करते
अपना सफर आगाज
राह में
सारे पड़ाव आने वाले थे
चलना तुम भी चाहते थे
साथ मैं भी चाहता था
दोनों का सोचना
एक ही था ।।
अपना साथ-साथ
चलना तो तय था
नई राह पे नई चाह पे
चलना तय था
एक समय, एक जगह पे
मिलना तय था
सब कुछ यहीं छोड़कर
बढ़ना तय था
हौंसला था उमंग थी
अपना साथ - साथ
जीना तय था
मंजिल तक
पहुंचना तय था,
मगर
नहीं निकले
तुम अपने घर से
और
मैं अपने
उसूलो से,
उलझे रहे
अपने ही भंवर से
निर्णायक पल में
जाने क्यों
तुम्हारे कदम
वापस मुड़ गए,
क्या सोचा
क्या समझ मे आया
यकीं नहीं था खुद पर
या जमाने से डर गए
मैंने तो हृदय से
प्रेम किया है तुमसे
इसलिए
लौट आने की
आस अब भी है तुमसे
मैं तो आज भी
उन्ही गलियों में
उन्हीं जगहों में
ढूंढता हूं तुम्हें,
वर्षों बाद भी
तुम्हारी प्रतीक्षा में
खड़ा हूं उसी मोड़ पे
जहां तुम थे छोड़ गए।।

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