कविता - अकेले

ख्वाबों की कश्ती
सच के दरिया में
एकाएक डूब गई
दो दिलों के बीच
बनी थी तरंग जो
अधबीच टूट गई
दरिया ठहरा है
और हवाऐं खामोश
कहीं कोई हलचल नहीं
अब कोई रास्ता
अब कोई मंजिल नहीं
दोस्त है दुनिया है
रिश्ते है काम है  
सुबह है शाम है
मगर कोई साथी
कोई महफ़िल नहीं।।
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- अशोक शिरोडे -

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