कविता - सेवक उद्दंड हो रहा

        सेवक उद्दंड हो रहा
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अखंड राष्ट्र आज खंड खंड हो रहा
शहीदों का स्वप्न खंड खंड हो रहा।।
मूढ़ थामे बागडोर हाँके चाहे जिधर
सत्ता लोलुपों का ताल मृदंग हो रहा।।
स्वतन्त्रता समता पर हुआ आघात
लोक का तंत्र खंड खंड हो रहा ।।
जात-पात, धर्म-द्वेष वैमनस्य बढ़ रहा
प्रगति का नित नया निर्बंध हो रहा।।
सदभाव विशाल नित संकीर्ण हो रहा
हिम शिखर गौरव खंड खंड हो रहा ।।
निज धरा का अपमान कर हो रहे खुश
पूरा वैभव इतिहास खंड खंड हो रहा ।।
पूरखों की कमाई एक पल में गमाई
लुटाकर घर अपना घमण्ड हो रहा ।।
अचार-विचार,नीति-नियम व्यर्थ हो गए
चहुं ओर सदाचार का पाखंड हो रहा।।
झूठों के राज में सच कहने वालों पर
प्रतिरोध दबाने राजद्रोह का दंड हो रहा ।।
रोजी रोटी शिक्षा काम की बातें हवा हुई
मद में डूबे भक्त, सेवक उद्दंड हो रहा ।।
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         -  अशोक शिरोडे -

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