कविता - स्त्री

   // स्त्री //

हर बार वो दो कदम बढा,
एक कदम पिछे हट जाती हैं
सपनों को बुनकर कारवां बनाती हैं
मंजिल सामने देख, 
फिर भावनाओं में बह जाती हैं।
दिल की लगी को दिल में दबा
मुस्कुराहटो की महफिल सजा,
वो अपने वहीं....
रोजमर्रा के कामों में लग जाती हैं,
कभी राशन की कतारो मे,
तो कभी
जिम्मेदारीयों मे दबी नजर आती हैं।
पर गढा हैं ईश्वर ने उसे कुछ इस तरह ,
कि हर तरफ से वह खुशनुमा नजर आती हैं।

-- डाँ निधि गुप्ता --
    बिलासपुर

Comments

Popular posts from this blog

संविधान की प्रस्तावना :

🔺 पानी-शरीर -स्वास्थ🔺हमें कैसा पानी पीना चाहिए! - (डॉ.अशोक शिरोडे)

डॉ. प्रकाश व डॉ मंदाकिनी आमटे