कविता-- मित्र
*मित्र*
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तिनका-तिनका हो जाये कारवां,
न ऐसा कोई सवाल कीजिए।।
मिल बैठकर सुलझाएं मसले अपने
चौराहे पर हो चर्चा न ये हाल कीजिए ।।
अपने है सभी यहां फिर संकोच कैसा
माथे पे उनके अबीर-गुलाल कीजिए ।।
जाने अनजाने हो जाती है गलतियां
सहज मान लें न कोई बवाल कीजिए ।।
एक बार झुका के सर अपना देखिए
रूठों को मनाने का कमाल कीजिए ।।
मित्र हो मित्रता का ख्याल कीजिए
नाम हो जाए सार्थक वो मिसाल कीजिए।।
मित्र का रिश्ता है खुद का बनाया हुआ
करीने से इसकी साज सम्हाल कीजिए।।
---*अशोक शिरोडे*---
Bhut bdiya sir
ReplyDeleteBhut jruri logon ka aachar vyavhar aisa hona
Bhut bdiya sir
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