कविता प्रेम

प्रेम
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प्रेम
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प्रेम तो पूजा है
मन की कामना है
जीवन की साधना है
ईश्वर की आराधना है,

प्रेम तो मानव धर्म है
हर धर्म का मर्म है
जीवन का कर्म है,

प्रेम तो भाव है                                      संतो का चाव है                                  विचारों का अलाव है                              सत्य की धाव है                                    मुक्ति की नाव है,

प्रेम तो प्रवाह है
मन से मन तक
कण से कण तक
चिन्तन से मनन तक
हिम् से पवन तक
सूक्ष्म से अनंत तक
जड़ से चेतन तक,

प्रेम तो दिशा है
तिमिर से प्रकाश की
धरा से आकाश की
शून्य से विकास की
व्यक्ति से समाज की
पराजय से प्रयास की,

प्रेम तो आशा है
जीवन की मीमांसा है
प्रकृति प्रदत्त भाषा है
संबंध सूत्रों का धागा है
अन्तर्मन की अभिलाषा है,

इन अर्थो में
प्रेम पर लगे
समस्त संशय-प्रश्नचिन्ह
स्वयं अर्थहीन है ।।

-*डॉ.अशोक शिरोडे* -

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