कविता- चारण- भक्तिगीत

//चारण- भक्तिगीत//

राजाओं के
राज में रहे
राज दरबारी
चारण- भाट
जिन्होंने
झूठी तारीफ में लिखी गाथा
जपते रहे माला
गाते रहे भक्तिगीत
समय की घड़ी
चलती रही
वर्षों हुए व्यतीत
समाज और
लोग बदल गए
बदला सारा राजकाज
किंतु
चारण-भाटों की
आज भी चल रही रीत
जो अब भी
गांव - शहर
गली- गली
लेकर ढपली
अपने राजा के
गा रहे हैं गीत
उधर
राजा हंस रहा है
अंधभक्तों की मूर्खता
और
अपनी धूर्तता पर ।।
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- अशोक शिरोडे

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