Posts

Showing posts from August, 2025

पानी-शरीर-स्वास्थ मानव शरीर में पानी की भूमिका(डॉ.अशोक शिरोडे)

🔺 पानी - शरीर - स्वास्थ् 🔺 मानव शरीर में पानी की भूमिका ------------------------------------     जल ही जीवन है ऐसा कहा जाता है ,  लेकिन क्यों इस पर कभी गंभीरता से विचार नहीं करते है। एक व्यक्ति 1 सप्ताह तक भोजन के बिना रह सकता है, लेकिन पानी की एक बूंद के बिना 3 दिनों से अधिक नहीं रह सकता है। जैसे ही मानव शरीर में 1% पानी की कमी होती है, उसे प्यास लगने लगती है। 5 प्रतिशत तक की कमी होने पर शरीर की नसें और इसकी सहनशक्ति कम होने लगती है। जब ऐसा होता है, तो शरीर थकावट महसूस करता है। अगर शरीर में पानी का स्तर 10 प्रतिशत तक गिर जाता है, तो व्यक्ति को धुंधला दिखाई देने लगता है। अगर शरीर में पानी की कमी 20 प्रतिशत तक हो जाती है, तो यह इंसान की मौत का कारण भी बन सकता है। यही कारण है कि मनुष्य को हमेशा अपने शरीर को पानी की आपूर्ति करनी चाहिए। अपने स्वास्थ्य में सुधार करना चाहते है तो यह समझना कि पानी आपके शरीर के लिए क्यों आवश्यक है, एक स्वस्थ, अधिक हाइड्रेटेड जीवन की ओर पहला कदम है।  यह पोषक तत्वों और ऑक्सीजन को कोशिकाओं तक पहुँचाता है, अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है, ...

परसाई की रचनाएं "सोचना" और "सवाल करना" सिखाती है (डॉ.अशोक शिरोडे)

               परसाई की रचनाएं  "सोचना" और "सवाल करना" सिखाती है -------------------------------------------------       हरिशंकर परसाई का नाम हिंदी साहित्य में व्यंग्य के स्तंभ के रूप में लिया जाता है। उनके लिए 'लोक शिक्षा' का अर्थ केवल स्कूली पाठ्यक्रम पढ़ाना नहीं था, बल्कि यह एक सशक्तिकरण का हथियार था।  हरिशंकर परसाई (1924-1995) हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध व्यंग्यकार थे, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज की कुरीतियों, विसंगतियों और राजनीतिक - सामाजिक भ्रष्टाचार पर तीखे प्रहार किए। उनका मानना था कि सच्ची शिक्षा वह है जो आम जन (लोक) को उनके अधिकारों, सामाजिक विषमताओं और शोषण के तंत्र के प्रति जागरूक करे। उनका लेखन 'लोक शिक्षण' (जनशिक्षा) का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। उनकी रचनाओं ने न केवल पाठकों का मनोरंजन किया, बल्कि उन्हें सामाजिक सच्चाई से भी रूबरू कराया।   लोक शिक्षा के प्रति विचार परसाई जी ने अपने लेखन को ही लोक शिक्षा का सबसे बड़ा माध्यम बनाया। उनकी रचनाएँ एक कक्षा की तरह हैं जहाँ पाठक समाज का यथार्थ पा...