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Showing posts from October, 2022

कविता -

डरपोक तानाशाह  ---------------------- यूं तो सभी  किसी न किसी नशे लफड़े में पड़े है नेता अधिकारी सफेदपोश, वर्दीधारी  भ्रष्टाचार के दलदल में पड़े है  उससे बाहर निकलने की  उनकी नहीं है चाहत मंत्री संत्री अपने पदों पर चिपके रहने के फेर में पड़े है सत्ता  के दलाल पूरी ताकत से देश के संस्थान बेचने पर अड़े है देशी अंग्रेज व्यापारी  बाजार कब्जाने में लगे है सियासत साधने सत्ता पाने दिलों में नफरत की ऊंची दीवार उठाने में लगे है सब छोटे या बड़े गड्ढे में पड़े हैं । बस कुछ सिरफिरे लोग हैं जिन्हें नशा है सच कहने सच देखने का जिन्हें नहीं है डर गाड़ी से कुचल दिए जाने का देशद्रोही- आन्दोलनजीवी  या कुछ और कहलाने का जिन्हें फिक्र है देश की  आने वाले नोनिहालो के कल की देश - संविधान  और लोकतंत्र के खातिर कफ़न बांध सर पे  कबीर-गांधी-भगतसिंह  की कठिन राह पर वह चल पड़े है  वे जानते है   लड़ाई मुश्किल है और उन्हें ही  हर मोर्चा लड़ना है  उन्हें अपने होंसलें अपनी जीत का  पूरा यकीन है क्योंकि झूठ फरेब के पैर नहीं होते है दुनिया के...

कविता - मधुशाला

           मधुशाला        ------------------- कोरोना काल मे ... बंद है पाठशाला भीड़ भारी है यहां ... खुली है मधुशाला, पीने पिलाने की ... अब क्या बात करें हाथ धुला रही ... कमबख्त मधुशाला, मंदिर मस्जिद के ... बंद रहे कपाट आबाद होती रही ... नित मधुशाला, न ख़ुशी गम की ... न गम खुशी का दिल को देती दिलासा ... एक मधुशाला, क्या बताये हाल ... मत करो सवाल नए रंग दिखाती ... यह मधुशाला, झगड़े-भेद मिटाती ... अपनो से मिलाती दिल के तार जोड़ती ... एक मधुशाला, देशी हो या विदेशी ... सरूर में कमी नहीं दवा का काम करती ... मस्त मधुशाला  ।।           -------------------------------                   अशोक शिरोडे

कविता - समझती नहीं हो

समझती नहीं हो  --------------------- तुम्हारा दीवाना है..  समझती नहीं हो मन आशिकाना है..  समझती नहीं हो! उलझा हूं कई बार.. जुल्फों के जाल में क्यों है दिल परेशां..  समझती नहीं हो! मैं पास आता गया.. तुम दूर होती गयी स्पर्श का अहसास.. समझती नहीं हो। मुस्काती हो जब.. हवा में आती है ख़ुशबू तराने गाता है दिल.. समझती नहीं हो।।  बसी हो हर श्वांस में.. मिलेंगे मधुमास में समय यूं ही रहा बीत.. समझती नहीं हो। मिलने की चाह में.. खड़े हैं राह में तुमसे ही है जिंदगी.. समझती नहीं हो। श्वांस है जब तक.. आस रहेगी तब तक सच्चे प्रेम का वास्ता.. समझती नहीं हो। अपने प्यार पर .. है एतबार मगर लंबा हुआ इंतजार.. समझती नहीं हो। हम चाहे न रहे.. तुम्हे बेवफा न कहे है यही फिक्र मुझे..  समझती नहीं हो । अपने प्यार के लिए.. प्यार से लिखा है  दिल की व्यग्रता .. समझती नहीं हो।। -------------------//--------------------          अशोक शिरोडे

कविता - चीता

चीता  -------------     चीता   ----------- जंगल का  जानवर है चीता वह नहीं पढ़ता बाईबल - कुरान पोथी पुराण या गीता उसका एक ही धर्म है शिकार के पीछे फुर्ती के साथ  तेज गति से दौड़ना  पलक झपकते शिकार को गरदन से दबोचना  बचने भागने का  मौका दिए बिना काम तमाम करना ..... फिर इत्मिनान से  अपनी फुर्ती, अपनी गति  अपनी सफलता पर हौले से मुस्कराते 'मन की बात' करना ।। ---------////-----–-----------     अशोक शिरोडे