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कविता - शिल्पकार

शिल्पकार कवि नहीं होता शिल्पकार वह तो होता है कलमकार शब्दों से खेलना तोड़ना-मरोड़ना और शब्दों का जाल बनाना जानता है कवि शिल्प और कला दोनों से दूर कलम और कागज में जीता है कवि शिल्पकार तो वह स्त्री - पुरुष हैं जो अपने अनमोल पसीनें से सींचते हैं धरा को रचते हैं श्रम का संसार जीवन के पन्ने पर  ।। * अशोक शिरोडे* 9039940034

इतिहास के पन्नों पर

इतिहास के पन्नों पर --------------------------- समय चक्र अपनी धुरी पर घूम आया फिर वहीं नई सदी में फिर पैदा हुआ पृथ्वी पर एक तानाशाह फिर आया हिटलर नाजीवाद और फासीवाद का वह दौर जिसे भुलाने की कोशिश पूरी दुनिया एक अरसे से कर रही  मानवता के माथे पर लगा कलंक का धब्बा जहां मौत तांडव करती, मानवता बिलखती आत्मा चीत्कार कर उठती नैतिकता है दम तोड़ती, युद्ध का उन्मांद लाशों का ढेर मांस लोथड़ों की सड़ांध नथुनों में घुसती लाशों पर बैठ क्रूर पाशविकता के पुजारी अपनी कामयाबी के हैं जहां दम भरते इतिहास के पन्नों पर .......।। *अशोक शिरोडे