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कवित - सामाजिक मूर्छा का दौर

अजब बदला है राजनीति का मिजाज इस दौर में सच की आवाज कहीं खो गई मन की बात - जुमलों के शोर में धन दौलत की चोरी को सुनते  थे वोट की चोरी होने लगी इस दौर में  मदारी के तमाशे में सब हैं मगन  कोई कुछ न बोले अंधभक्ति के दौर में   राजा और रंक दोनों है अपने मे मस्त सामाजिक मूर्छा के इस विकट दौर में।। - अशोक शिरोडे -