कविता "तुम ही कहो"
- तुम ही कहो - ---------------------- हो रही धीमी धीमी बारिश बह रही मीठी बयार है, तुम ही कहो तुम्हे किससे प्यार है । आ रही माटी की सोंधी खुशबू पेड़ पौधे खिल उठे रंग बिरंगे फूल महक रहे है जल थल नभ में मची है हलचल मौसम के स्वागत में पक्षी चहक रहे है, वातावरण पूरा हरियाली से आच्छादित है प्रकृति के आनंद में कण कण आल्हादित है, एक तुम ही हो जो अकारण मौन हो , सोचो तो सही शायद मुद्दा गौण हो, मन की बात बोलना बोलते रहना जरूरी है, जिह्वा का व्यायाम न होने पर वह अचल हो जाएगी एक अंतराल पश्चात नहीं निकलेगा कंठ से स्वर फिर तुम प्यार के गीत कैसे गाओगी-गुनगुनाओगी । ------------------------------------- अशोक शिरोडे